कविता

चक्रव्यूह !

  इस जिंदगी का क्या भरोसा कब शाम हो जाय , भरी दोपहरी में कब सूरज डूब जाय …. उम्मीद के पतले  सेतु के सहारे मकड़ी सा  आगे कदम बढ़ा रहे है और खुद के बुने जाले में फंसकर छटपटा रहे है |   क्या यह मेरा भ्रम है ? कि जाले मैं ने बुने […]