कविता

भारत माता दुखी हो गई

भारत माता दुखी हो गई सुनकर अपने बच्चों की वाणी। जो बोल रहे हैं रिश्वत जैसी गाली। भारत माँ भी कह उठी – “बच्चों ने किया ऐसा बुरा हाल कि मै हो रही हूँ बेहाल। मै थी पहले सोन चिड़इया नेता मुझे खा गए। अपनी भारत माँ के नाम पर करोड़ों को यह डकार गए।” […]

लघुकथा

डूबा हुआ शहर

दो दिनों से लगातार पानी बरस रहा था। चारों तरफ पानी ने त्राहि त्राहि मचा रखी थी। घर में पानी भर गया तो मरियम छत पर आकर मदद की राह देखने लगी। “हे प्रभू ये कैसी विपदा आ गई। मेहनत से संजोई हुई गृहस्ती बर्बाद हो गई। अब तो रहम करो।” तभी छत के ऊपर […]

लघुकथा

तसल्ली

नर्स ऑपरेशन से पहले कुछ दवाएं देने आई तो देखा कि मि. दत्त कुछ परेशान हैं। “घबराइए नहीं सर डॉ. खान माने हुए सर्जन हैं।” मि. दत्त को ऑपरेशन की चिंता नहीं थी। उनकी निगाहें दरवाज़े पर लगी थीं। तभी घर से कुछ आवश्यक सामान लेकर लौटी पत्नी के साथ ही उनके चेहरे पर मुस्कान […]

लघुकथा

आत्मिक सुख

विभूति बाबू के रिटायरमेंट को करीब छह महीने बीत गए थे। उनके कमरे में चारों तरफ साहित्यिक किताबें रखी थीं। वह कागज़ कलम लेकर कुछ लिख रहे थे। तभी उनके चचेरे भाई उनसे मिलने आए। “अभी तक तक कलम घिसने से जी नहीं भरा ?” अपने भाई के प्रश्न के जवाब में विभूति बाबू बोले। […]

लघुकथा

स्वागत

जीत के ढोल नगाड़े बजाते हुए वह लोग दरवाज़े पर आ गए। “बेदाग छुड़ा लाया तुम्हारे बेटे को। स्वागत करो इसका।” दरवाज़े पर थाली लिए खड़ी रुक्मणी ने अपने पति की आज्ञा का पालन करते हुए बेटे को तिलक लगाया। स्वागत के बाद वह अपने कमरे में आ गई। घुसते ही आदम कद आईने में […]

लघुकथा

जीवन और श्वास

आलाप और रागिनी छोटे से शहर के बड़े गायक थे। दोनों की म्यूज़िकल नाइट्स शहर में धमाल मचा रही थीं। दोनों का रिश्ता ऐसा था जैसे कि जीवन का श्वास से। अपना शहर जीत लेने के बाद इच्छा मुंबई की मायानगरी में किस्मत आज़माने की हुई। दोनों फिल्मों के लिए गाने लगे। पहले साथ साथ […]

लघुकथा

सीख

रजत बड़ी उम्मीद के साथ अपने न्यूज़ चैनल के एडिटर के सामने खड़ा था। “सर उस दिन निर्माणाधीन पुल के गिरने से हुए हादसे को मैंने पर्त दर पर्त उधेड़ दिया है। आज शाम प्राइम टाइम में यह न्यूज़ न्यूज़ चलाइए।” एडिटर महोदय ने बड़े दार्शनिक अंदाज़ में कहा। “तुम एक अच्छे रिपोर्टर हो। पर […]

कविता ब्लॉग/परिचर्चा विविध सामाजिक

हम ज़िंदा कब थे?

हम ज़िंदा कब थे? अगर हम ज़िंदा होते तो किसी औरत को बलात्कार नहीं सहते किसी व्यक्ति की निंदा नहीं करते भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाते न कि उसमे भागीदारी बनते अगर हम ज़िंदा होते तो डॉनेशन लेकर विध्या की अपमान नहीं करते लड़कियों को कोख में नहीं मारते देहज जैसा पाप नहीं करते अगर […]

लघुकथा

समय के अनुसार

गुप्ता जी अपने मित्र के प्रश्न की प्रतीक्षा कर रहे थे। वह जानते थे कि एक अर्से के बाद मिले उनके प्रिय मित्र उनके जीवन के नए बदलाव के विषय में जानने को उत्सुक थे। इसी कारण उन्होंने भोजन के बाद टहलने जाने का प्रस्ताव रखा था। गुप्ता जी की प्रतीक्षा जल्दी ही समाप्त हो […]

लघुकथा

बहार का मौसम

अगले कमरे से आ रही ठहाकों की आवाज़ में जगत न्यूज़ नहीं सुन पा रहे थे। उन्होंने टीवी बंद कर दिया और जाकर सबके साथ बैठ गए। बीते दिनों की बातें चल रही थीं। “पापा आपको याद है बचपन में जब हम घूमने गए थे तब मम्मी खो गई थीं।” बेटे ने याद दिलाते हुए […]