मुक्तक/दोहा

दोहे (हिंदी दिवस विशेष)

हिंदी में बसते सदा, तुलसी सूर कबीर।
बसे बिहारीलाल हैं, अरु मीरा की पीर॥1॥

हिंदी भाषा ग्राम्य है, ऐसा व्यर्थ विचार।
अतिशय सुंदर सरस है, पढ़े-लिखे संसार॥2॥

राम चरित मानस सरिस, हिंदी में सद्ग्रंथ।
जिसके पाठन-पठन से, पाए कई सुपंथ॥3॥

खुसरो की मुकरी करें, हिंदी का श्रृंगार।
सरस बहे रसखान से, सतत् भक्ति रसधार॥4॥

हिंदी भारत भाल की, बिंदी है अभिराम।
हिंदी से होती सुबह, हिंदीमय है शाम॥5॥

हिंदी अपनी सभ्यता, हिंदी अपना धर्म।
हिंदी रीति-रिवाज है, हिंदी हैं शुभ कर्म॥6॥

हिंदी को मैंने पिया, घुट्टी के ही संग।
हिंदी ने मुझको दिया, जीने का इक ढंग॥7॥

हिंदी बस भाषा नहीं, हिंदी है संस्कार।
हिंदी में ही दिख रहा, अनुपम सद्व्यवहार॥8॥

दोहा-रोला-सोरठा, चौपाई से छंद।
हिंदी कोटिक रत्न में, अनुपम कई प्रबंध॥9॥

हिंदी गंगा जानिए, दोनों एक समान।
अपने में ले सब समा, गैर नहीं अनुमान॥10॥

पीयूष कुमार द्विवेदी 'पूतू'
स्नातकोत्तर (हिंदी साहित्य स्वर्ण पदक सहित),यू.जी.सी.नेट (पाँच बार) जन्मतिथि-03/07/1991 विशिष्ट पहचान -शत प्रतिशत विकलांग संप्रति-असिस्टेँट प्रोफेसर (हिंदी विभाग,जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय चित्रकूट,उत्तर प्रदेश) रुचियाँ-लेखन एवं पठन भाषा ज्ञान-हिंदी,संस्कृत,अंग्रेजी,उर्दू। रचनाएँ-अंतर्मन (संयुक्त काव्य संग्रह),समकालीन दोहा कोश में दोहे शामिल,किरनां दा कबीला (पंजाबी संयुक्त काव्य संग्रह),कविता अनवरत-1(संयुक्त काव्य संग्रह),यशधारा(संयुक्त काव्य संग्रह)में रचनाएँ शामिल। विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। संपर्क- ग्राम-टीसी,पोस्ट-हसवा,जिला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)-212645 मो.-08604112963 ई.मेल[email protected]