कविता

कविता

कविता
सरस सुवासित परम् मनोहर
प्रातः बेला सुखद सुहावन ।
नवल सूर्य की नवल रश्मियाँ
सदा बनाएं जग को पावन ।
धरती पर फैली हरियाली
नव कुसुमों की महक लुटाती,
बिखर रही है स्वर्ण लालिमा
दशों दिशाएं अति हर्षाती।
गुंजित हो खगकुल का कलरव
नदियों की निर्मल धारा हो ।
दुःख क्लेश भय रोग नष्ट हों
स्वस्थ अखिल भारत प्यारा हो।
मधुमय मौसम रस वासन्ती
स्वावलंबन की ज्योति जलाए।
बूंद बूंद से घट भर जाता
जीवन का यह मर्म बताए।
‘मृदुल’ मनोहरता से भारत माँ
का आओ दामन भर दें ।
फिर सद्कर्मो के द्वारा हम
हर पथ को आलोकित कर दें।
मंजूषा श्रीवास्तव’मृदुल’

*मंजूषा श्रीवास्तव
शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016