धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

उपासना

ओ३म् भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रपश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरंगैस्तुष्टुवाँ सस्तनुभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः॥ यजु० २५।२१
स्तुति किसकी करनी चाहिए और क्यों करनी चाहिए, यह प्रश्न आज साधारण जनता के मस्तिष्क में उत्पन्न होता है। केवल इतना ही नहीं इसके साथ अन्य अनेक प्रश्न भी वे करते हैं । किन्तु प्राचीन काल के पुरुष यह शंका नहीं किया करते थे कि स्तुति, प्रार्थना और उपासना किसे कहते हैं और यह क्यों करनी चाहिए। उनका आचार ऊंचा था। आजकल के मनुष्यों में समझ कम और कुतर्क अधिक है, आचार नहीं है।
जो परमात्मा को नहीं मानते उनसे तो हमें कुछ भी नहीं कहना है, लेकिन मानने वाले भी कई बार कहते हैं कि जब परमात्मा हमें कर्मों का फल देगा, तो उसकी स्तुति आदि हम क्यों करें ? उसकी स्तुति आदि करना उसकी खुशामद ही तो है । यह भी देखने में आता है कि उपासना करने वाले झूठे और बेईमान हैं तथा उपासना न करने वाले अकसर अच्छे होते है फिर यह भी प्रश्न है कि भगवान नास्तिक क्यों उत्पन्न किये ? इसका भी कारण है। परमात्मा ने इस संसार में जो कुछ किया है, ठीक ही किया है । भगवान को किसी काम से कोई हानि लाभ नहीं । वह पूर्ण है। उसमें किसी भी प्रकार का कोई जोड़ या बाकी नहीं। मनुष्यों को शिक्षा देने के लिए हो उसने यह सब इन्तजाम किया।
नास्तिक लोगों को उत्पन्न करने का लाभ यह है कि जो मनुष्य अपने को ईश्वर भक्त कहते हैं, किन्तु इनके कर्म गिरे हुये हैं और नास्तिक का आचरण ऊंचा है, तो फिर ईश्वर को मानने से और स्तुति प्रार्थना और उपासना करने से क्या लाभ ? भगवान के गुणों का कोई प्रदर्शन नहीं होता। जो नाम के उपासक हैं, वे अपने काम से भगवान को नहीं मानते हैं लेकिन जो नाम के उपासक नहीं, वे काम से भगवान को मानते हैं। यह शंका करने वालों ने उन्हें पेश किया।
भगवान तो सदा भक्तों का साथी होता है। वह भक्त के वश में सदा से होता आया है। भगवान हमें कर्मों का फल देगा, उपासना का फल देगा। भगवान ने हमें बहुत सी चीजें दी हैं हमें उसको धन्यवाद देना चाहिए । शंका करने वाले कहते हैं कि यह बात तो है, लेकिन इतनी सन्ध्या करने की क्या आवश्यकता है ? नहीं इसका भी फल है । क्या ? मन को दो वृत्तियां होती हैं, अन्तमुख और बहिर्मुख । वृत्तियों का केन्द्र नाभि है । वृत्तियां जितनी भी दूर जाती हैं, उनको कौन रोकता है ? नाभि । जिस प्रकार कोई गधा या घोड़ा एक खूटे में बधी रस्सी से बन्धा हुआ है, वह गधा या घोड़ा उस रस्सी से बाहर नहीं जा सकता । जगत में जहां तक लाभ लेना चाहिए वहां तक हमारी प्रवृत्ति जानी चाहिए, सीमा से बाहर नहीं । अति सब जगह बुरी होती है- “अति सर्वत्र वर्जयेत” जिस प्रकार आचार तो ठीक है यदि उसके साथ अति लगा दें तो अत्याचार हो जाता है। इसलिए जगत में अति किसी काम में नहीं करनी चाहिए और मर्यादा में हो रहना चाहिए।
ईशावास्यमिदं सर्व यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुजीथाः मा गृधः कस्य स्विद्वनम्॥
यजु०४०।१
इस संसार में जो कुछ भी है उसमें परमात्मा बसा हुआ है। इसलिये इस जगत को त्याग-भाव से ही भोगना चाहिए इसमें फंसना नहीं चाहिये और लिप्त नहीं होना चाहिये संसार की ओर खिंचना नहीं चाहिए लेकिन इसका मुकाबला करना चाहिये।
लार्ड वेम्ले की माता अपने पुत्र से कहती है कि यदि तुम यह मालूम करना चाहो कि कौन-सा आनन्द ग्राह्य है और कौन-सा त्याज्य है, तो सदा इस नियम को याद रखो कि जो बात तुम्हारी विवेक शक्ति को निर्बल कर दे, तुम्हारी कोमलता को बिगाड़ दे ईश्वर सम्बन्धी विचारों को क्षीण कर दे, जो शरीर के प्रभाव और शक्ति को मन पर चढ़ा दे वह तुम्हारे लिये पाप है। सन्ध्या में भी यही बात है । परमात्मा का चिन्तन करते हुए हम संसार की मर्यादा से बाहर न हो जायें, यही फल सन्ध्या का है। यदि कहें कि तब तो हर समय ही सन्ध्या करते रहना चाहिये, नहीं ऐसा करने से तो अव्यवस्था हो जायेगी । निरन्तर किसी काम के करने में कोई आनन्द नहीं है।
यदि हम पेट-भर कर हलवा खा लें, उसके बाद फिर कोई कहे कि हलवा और खा लो तुम्हारी इच्छा हलवा खाने के लिए बिलकुल न होगी । एक विद्यार्थी परीक्षा में पास होने के लिए कितना परिश्रम करता है, लेकिन जब एक बार पास हो गया तो इस बात को सुनकर जो उसे आनन्द हुआ वह प्रतिक्षण घटता चला जाता है। इससे यह पता लगता है कि इष्ट पदार्थ की प्राप्ति में ही आनन्द है। एकाग्रता होने से आनन्द की प्राप्ति होती है। परमात्मा की लहर हममें दौड़ जाती है। परमात्मा आनन्दधन है उसकी शरण में जाने से कोई भी दुःख शेष नहीं रहता। तो क्या बिना सन्ध्या किये परमात्मा हमारे दुःख दूर नहीं कर सकता? ऐसी बात नहीं है। मन में दुःख दूर करने की भावना तो रखनी ही पड़ेगी। यदि आपके मन में न हो तो भला आप अपनी अंगुलियां को फैला कैसे सकते हैं? जब अंगुलियों को फैलाने की बात मन में होगी तभी अंगुलियां फैलेंगी। इसलिए यदि हम सदा परमात्मा का चिन्तन रखेंगे, तो मर्यादा से बाहर नहीं हो सकेंगे।
शंका करने वाले कहते हैं कि सन्ध्या एक समय ही पर्याप्त है फिर प्रातः और सायं दो बार सन्ध्या करना क्यों बताया? देखिये आप साफ कुर्ता पहनते हैं, आप यह नहीं चाहते कि वह मैला हो जाये, बहुत सावधानी आप रखते हैं कि आपका कुर्ता साफ हो रहे, किन्तु फिर भी वह मैला हो हो जाता है। इसी प्रकार आप एक बार सन्ध्या करके अपना मन पवित्र बनाते हैं तो फिर उसको पवित्र रखने का प्रयत्न करते रहने से भी उसमें अपवित्रता आ ही जाती है। जब हमारा स्वार्थ दूसरे के स्वार्थ से टकराता है, तब मन में मलिनता का आ जाना भी स्वाभाविक हो जाता है।
प्रातःकाल की सन्ध्या से रात के पाप नष्ट होते हैं और सायं काल की सन्ध्या से दिन में किये हुए पाप नष्ट हो जाते हैं । मुसलमानों ने भी पांच बार की नमाज को महत्व दिया है। उनका कुरान कहता है कि अपनी नमाजों की हिफाजत करो और बीच की नमाज की भी हिफाजत करो । बीच की नमाज को विशेष रूप से इसलिए कहा कि इस नमाज का समय दिन के तीसरे पहर ४ बजे का होता है, उस समय सब मनुष्य अपने काम धन्धे में जुटे रहते हैं। कुरान का अभिप्राय यह है कि जब तुम अपने सांसारिक कार्यों में उलझे हुए हो, उस समय भी परमात्मा का चिन्तन करते रहो । हम प्रातः सायं भगवान के गुणों से वंचित न हो जायें इसलिए दोनों समय सन्ध्या करना आवश्यक है।
स्तुति का अर्थ प्रशंसा करना है। उस परमात्मा का परिचय प्राप्त करना स्तुति कहलाता है। जब परिचय हो गया तब उसके प्रति प्रेम भी उत्पन्न होगा ।जब हमें यह मालूम होगा कि भगवान ने हमें कैसे अच्छे पदार्थ दिये हैं तभी उसके प्रति हमारा प्रेम उत्पन्न होगा। माता हमें अच्छे पदार्थ देती है। हमारे हित का काम करती है इसलिए हम उससे प्रेम करते हैं । इसी प्रकार भगवान् का गुणानुवाद करके यदि हम उसका नाम लेंगे तभी तो हम रस का स्वाद मिलेगा और परमात्मा के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है । आज जनता सूरैया से परिचित है, उसकी स्तुति करती है इसलिए उसके प्रति जनता का प्रेम है। उसके देखने के लिए अपार जन-समूह एकत्र हो जाता है। किन्तु उस भगवान की स्तुति आज जनता नहीं करती, उसकी प्रशंसा में तो यदि घण्टा व्यतीत हो जाये, तब भी कम है। परमात्मा के पास वह कौन सी मशीन लगी है जिससे वह समुद्र के खारे जल को स्वच्छ और मघुर बना देता है, फिर उसे किस सुन्दरता से बरसाता है ? उसे देखने में भी कितना आनन्द आता है। आपके बढ़िया फव्वारे को देखकर भी वह आनन्द प्राप्त नहीं होता।
ईश्वर की स्तुति करते हुए हमें मन में यह धारणा बनानी चाहिये कि मैं किस प्रकार उसके इन अमृत पुत्रों को आनन्द पहुंचा सकता हूं? हम परमात्मा के गुणों को अपने अन्दर धारण करें। परमात्मा के गुणों का चिन्तन करते हुए हमें परमात्मा की सोहबत में बैठना चाहिए : शंतान की सोहबत में हम न रहें जो कि दुनियां को सन्मार्ग से भटकाने वाला है। पुलिस सुपरिटेण्डेण्ट सदा ही सोचता है कि मैं अपराधी को किस प्रकार जेल भेजू ? हमें भगवान की सोहबत में रहकर भगवान के गुणों को धारण करना चाहिए । सन्ध्या करने से हम भगवान् की सोहबत में बैठते हैं । देखिये जब कोई सन्ध्या करने बैठता है तब उसके आस-पास के सब मनुष्यों और बाल-बच्चों को भी चुप कर दिया जाता है कि देखो वे सन्ध्या कर रहे हैं ? वे भगवान को सोहबत में बैठे हैं, इस समय चुप रहो। ऐसा न हो कि तुम्हारे शोर मचाने से वे भगवान् की सोहबत में न रह सकें।
सन्ध्या का तात्पर्य इसके सिवाय कुछ भी नहीं है कि आप परमात्मा जैसा अपने आपको बनाने का प्रयत्न करें। स्तुति से प्रेम उत्पन्न होने के बाद प्रार्थना की जाती है। उसका प्रकार यह है –
तेजोऽसि तेजो मयि धेहि, वीर्यमसि वीर्य मयि धेहि ।
बलमसि बलं मयि धेहि, प्रोजोऽस्योजो मयि घेहि ।
मन्युरसि मन्यु मयि धेहि, सहोऽसि सहो मयि धेहि ।
यजु०
हे भगवान! आप तेजस्वी हैं, मुझे भी तेज प्रदान करो। आप उत्पादक शक्ति से युक्त हैं, मुझे भी उत्पादन शक्ति प्रदान करो। आप बलवान हैं मुझे भी बल प्रदान करो। आप दुष्टों के दण्ड देने वाले हैं। मुझे भी दुष्टों को दण्ड देने की सामर्थ्य प्रदान करो। आप सबसे बढ़कर सहनशील हैं, मुझे भी सहन शीलता प्रदान करो।
प्रार्थना के बाद उपासना करनी चाहिये । उपासना का अर्थ है- निकट बैठना। परमात्मा के गुणों को धारण करके उसके समीप बैठना ही उपासना कहलाता है। जो सच्चा उपासक है वह पहाड़ जैसा बड़े से बड़ा दुःख आने पर भी नहीं घबरायेगा और बड़े से बड़े सुख में भी इतरायेगा नहीं।
स्तुति से प्रेम उत्पन्न होता है प्रार्थना से अभिमान का नाश होता है, उत्साह में वृद्धि होती है और सहायता मिलती है । उपासना करने वाले को कोई भी भय नहीं रहता।
लोग कहते हैं कि मूर्तिपूजा से क्या हानि है ? मैं पूछता हूं कि क्या मूर्ति कुछ अनुभव करती है ? मैं मूर्ति के विरुद्ध नहीं किन्तु आप तो उस मूर्ति के प्रति चेतनवान व्यवहार करते हैं । आपके पिता जी की मृत्यु हो गई और उनका शव वहां पर पड़ा है आप अपने मृत-पिता के मुख में दवाई डालें, तो क्या उससे उन्हें कुछ लाभ होता है ? राम की मूर्ति आप रखें, फिर राम राम कहते रहें, तो उससे क्या होगा?
यदि राम की मूर्ति की देख-देख कर उनके चरित्र को याद करें और तदनुकूल व्यवहार करें, तो कुछ लाभ हो भी सकता है। किसी के चरित्र से कोई लाभ नहीं । हम मूर्ति के सामने बैठ जाते हैं, किन्तु अपने चरित्र को नहीं बनाते । गुजरे हुए महापुरुषों के चित्रों को हम इनके चरित्र के आधार पर ही बनाते हैं, तो फिर उनके चित्र बनाने की आवश्यकता ही नहीं। जब कि चरित्रों के आधार पर ही हम उनके चित्र की भो कल्पना कर सकते हैं, फिर चित्र बनाने की आवश्यकता ही क्या रही? हमने एक पत्थर को खुद ही काट-छांट कर रख दिया और उसका नाम भगवान रख लिया। यह बहुत उचित कैसे हो सकता है? हमें करना तो कुछ और था और हम करने लगे कुछ और –
बुतपरस्तों का है दस्तूर निराला देखो।
खुद तराशा है मगर नाम खुदा रखा है॥
व्याख्याता – शास्त्रार्थ-महारथी पं॰ रामचंद्र देहलवी जी
प्रस्तुति – डॉ विवेक आर्य

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