भाषा-साहित्य

साहित्य बौद्धिक स्तर को बढ़ाने की पुड़िया है

सोचिए साहित्य न होता तो? ज्ञान का स्तर बुद्धि के नक्शे में नीचे की सतह पर मृत्युशैया पर लेटा होता। साहित्य समाज का दर्पण है। हर भाव, हर रस, रुप, रंग, विचार और घटनाओं को अभिव्यक्त करने का ज़रिया है साहित्य। साहित्य का आगमन वो क्रान्ति है जिसने प्रबुद्ध लेखकों को अपनी कल्पना और विचारों द्वारा समाज को मानव सभ्यता का विकास और बौद्धिक स्तर पर संपन्न करने का काम किया। साहित्य को लेखकों और विद्वानों द्वारा विभिन्न अवधियों और विभिन्न संस्कृतियों के माध्यम से भाषा के लिखित कार्यों के संग्रह के रूप में परिभाषित किया गया है।
कितनी शैलियों में बँटा कलात्मक शब्द के रूप में साहित्य लिखित कार्यों को संदर्भित करता है जैसे उपन्यास, लघु कथाएँ, आत्मकथाएँ, संस्मरण, निबंध और कविता। शास्त्रसमूह को साहित्य कह सकते है। स+हित+य के योग से बना है साहित्य।
साहित्य स्त्रोत है उस उर्जा का, जो फूलों की खुशबू को परिभाषित करता है, वो चेतना है जो समाज को जागरूक करती है, वो रास्ता है जो इंसानों को ज़िंदगी से मिलवाता है, वो सज़दा है जो आशिक अपनी माशुका के माहताब को चाँद समझकर करता है, साहित्य लेखकों की कल्पनाओं को साकार रुप देने वाला साँचा है। बादलों को रुई की फ़ाहों का उपमान देकर गज़लों की पंक्तियों को मायने देता आईना है। साहित्य वंदना है, साहित्य बौधिक स्तर को बढ़ाने वाली जादुई पुड़िया है।
कहा जाता है कि परिवर्तन संसार का नियम है, लेखन में भी स्वतंत्रता की चिंगारी पीढ़ी दर पीढ़ी गुजरते आग का स्वरूप ले रही है। समय के चलते साहित्य में भी बदलाव आता रहा है।
हर युग के लेखकों ने अपनी सोच, अपनी कल्पनाओं को उड़ान देते साहित्य को ओर निखारा है। वैष्वीकरण की तेजी से घटती घटनाओं का साहित्य लेखन पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। एक भाषा का लेखक अन्य भाषाओं के प्रचलित शब्दों को अपनी रचना में सम्माननीय स्थान दे रहा है। आज हिन्दी और उर्दू में बड़ा अन्तर केवल लिपि का रह गया है जो बहुत ही प्रेरणादायक है।
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और उसके बाद दुष्यंत कुमार ने कविताओं के लेखन के बदलता स्वरूप समाज के सामने रखा। हिन्दी में अतुकान्त और अगेय कविताओं के रास्ते खुल गए। जो छन्दबध्ध रचना नहीं लिख सकते थे उनके लिए भी द्वार खुले। हिन्दी में गजलें लिखी जाने लगी तथा पसन्द की जाने लगी। नज़्मे लोगों को समझ में आने लगी।
साहित्य लेखन के बदलते स्वरूप के अंतर्गत स्तंभ बदलते है, उपमाएं बदली है, प्रतीक चिन्ह बदले है। अब सुंदर आँखों को कवि कमल के फूल की उपमा नहीं देता। लबों को पंखुडियां नहीं लिखता न गेसूओं को घने बादलों के उपमान से सजाता है। ऋतुओं के वर्णन में भी कवियों की उतनी रूचि नहीं रही। पर हाँ प्यार, इश्क, मोहब्बत आज भी कवियों की पहली पसंद है ये बहुत अच्छी बात है। दिल जुड़ने से लेकर टूटने पर असंख्य कविताएँ लिखी जाती है। प्रेम आजकल चाईना के सामान जैसा जो बन गया है। इसके साथ अब साहित्यकार सूखा, बाढ़, भूकम्प, राजनीति, कालेधन, और भ्रष्टाचार जैसी समसामयिक समस्याओं पर लिखता है। लम्बी रचनाएं अब मुक्तक काव्य का रूप ले रही है। ये सब पढ़ कर मैथलीषरण गुप्ता जी की पंक्तियां याद आती है कि परिवर्तन ही यदि उन्नति है, तो हम बढ़ते जाते है, किन्तु मुझे तो सीधे सच्चेपूर्व भाव ही भाते है। बात तो सही है जो आम पाठकों के दिल को छू जाए वही साहित्य सबको भाता है। साहित्य सागर है, शब्दों के घट में छुपे खजाने को जिसने ढूँढ लिया वही सरताज है साहित्य का।
— भावना ठाकर ‘भावु’ 
*भावना ठाकर
बेंगलोर