कविता

कमबख्त मोहब्बत

तुमको भुलाने की आखिरी कोशिश नाकाम हो गई
कमबख्त मोहब्बत में मेरी अरमान बदनाम हो गई

इश्क की गुरबत में चमन अब गुलफ़ाम हो गई
पतझड़ के बेरहम हाथों चमन वीरान हो गई

ना चाहते हुए दोस्तों ने हाथ जाम थमा दिया
मयकशी में साकी ने अपना नाम मेरे नाम कर दिया

आदमी था कभी काम का अब बेकाम कर गया
किस किस को समझाऊँ इश्क ने बदनाम कर गया

सोंचा था ख्वाबों में अपना होगा एक आशियाना
पर वक्त ने मेरे सपने को नाकाम कर दिया

कैसे जीवन जी लुँगा ओ रब हमको तुम बतलाना
पीता हूँ भुलाने गम गुमनाम ना कभी कर जाना

सपने देखने से भी अब लगता है डर हमें भी
कहीं बरबादी का सबब ना बन जाये अरि कभी

कद्रदानों की कमीनहीं है जमाने को कोई समझाये
सैयाद चमन में आकर कहीं जाल में ना फँसा जाये

— उदय किशोर साह

उदय किशोर साह

पत्रकार, दैनिक भास्कर जयपुर बाँका मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार मो.-9546115088