ग़ज़ल
डूब न जाये कश्ती कहीं हौसला अपार ज़िंदा रख।
डगमगाये नहीं मझधार में पतवार ज़िंदा रख।।
मानवता की बन मिसाल कहीं कोई टूट न जाये।
ज़ुबां पर मिठास दिल में प्यार तो ज़िंदा रख।
रंगीनियाँ देखकर कभी भी डूबना उनमें नहीं।
आगे बढ़ जाने के कुछ आसार तो ज़िंदा रख।।
चाँद – तारों को तोड़ लाने की बात करे जो।
बाल – बच्चों के अरमानों का संसार तो ज़िंदा रख।।
नशे में डूब बर्बाद होने की सोचना मत कभी।
मानव धर्म नेक बहुत है परिवार को ज़िंदा रख।।
किसी ग़ैर की बाँहों में जाना ही कभी नहीं।
शराफ़त नेकियाँ नीयत अदद किरदार जिंदा रख।
घर में तुम्हारी संगिनी कई किरदार निभाती है।
मंज़िल पाने प्यार से उस नार को ज़िंदा रख।।
— रवि रश्मि ‘अनुभूति’
