डर के आगे जीत है
ऐ मन आखिर तू क्यों
इस कदर भयभीत है
क्या तुझे पता नही है कि
डर के आगे जीत है ।।
बिना जोखिम लिए भला
कोई कहां निखरता है
आखिर तप–तप कर ही तो
सोना आभूषण बनता है।।
ये छोटी -मोटी ठोकरें ही तो
अन्ततः तुझे मजबूत बनाएंगी
पहले ही हार मान बैठोगे
तो मंजिल कैसे नजर आएगी।।
एक प्रयास में ही बड़ी सफलता
तो बिरलों के ही हाथ लगती है
लक्ष्य पर लेकिन जो डटे रहते
कायनात उनके सम्मुख झुकती है
इतिहास उदाहरणों से भरा पड़ा है
कड़ी मेहनत सदा रंग लायी है
दृढ़ इच्छाशक्ति के बलबूते
कमजोर देशों ने विजय पाई है।।
तमाम चुनौतियों के बावजूद
जो हार मानने को तैयार न होते
एक दिन वो ही शिखर को छूकर
असफलताओं के दाग़ को धोते।।
फिर तू किस पशोपेश में फंसकर
आगे बढ़ने से कतराता है
ऊपरवाला तुझ पर मेहरबान है
नाहक ही तू क्यों घबराता है।।
वैसे भी तो एक दिन सबको
इस नश्वर जगत से जाना है
जो हिम्मत व धैर्य से काम लेते
उनके पीछे ही सारा जमाना है।।
जो हिम्मत व धैर्य से काम लेते
उनके पीछे ही सारा जमाना है।।
— नवल अग्रवाल
