नव गीतिका
ध्यान से निकला करो मौसम सुहाना है
कब बरस जाए यह बादल दीवाना है।
चौंक मत जाना कभी बिजली की गहरी कौंध से
इस तरह ही देखता सब को जमाना है।
पींग धीरे से बढ़ाना संग में मल्हार के
देख ये कब से रहा बरगद पिराना है।
बैठ लो कुछ देर सुस्ता लें जरा इस छाँव में
हाल अपना आप का सुनना सुनना है।
रास्ता भटके तो क्या चल तो रहे ही है
आप हैं जब साथ रस्ता मिल ही जाना है।
झिंम झिमा झिंम झिंम पड़े जब मेह की बूंदे
सम्भल कर चलना नहीं दिल टूट जाना है।
समझ कर भी समझ न आये तो समझना किसे
बने रहना अन्समझ ये तो बहाना है।
बात न करना कभी इठला के मुंह को फेरना
क्या बताएं शौक ये उन का निराला है।
बीच जुल्फों के कभी नजरें उठा कर देखना
क्या अदा है देख कर पर्दा गिराना है।
ख़्वाब फिर फिर देखना इस में बुरा क्या है
सहारे उम्मीद के ही ये जमाना है।
हाथ लकुटी कमरिया और अपने पास
क्या मन किया जब बिछा ली वो ही ठिकाना है।
सहन कर लो वेद ये बेदर्द दुनिया है
क्यों किसी को व्यथा का किस्सा सुनना है ।
— डॉ. वेद व्यथित
