लघुकथा

दहेज के पंख


शादी के दिन रेखा को उसके मायके से एक बड़ी सी ट्रॉली मिली — बर्तन, गहने, कपड़े। सास ने कहा — “अच्छा है, कुछ बोझ तो हल्का हो गया।”

रेखा को लगा वह उड़ने आई थी, पर यहाँ तो पंखों पर बोझ था। हर उपहार उसकी योग्यता से बड़ा हो गया था।

एक दिन उसने नौकरी की बात की, तो जवाब मिला — “जब सबकुछ मिल गया है, तो ज़रूरत क्या है?”

रेखा ने कहा — “मुझे उड़ना है, दिखावा नहीं।”

वह ट्रॉली को छोड़, अपनी डिग्री लेकर निकल पड़ी — असली पंख वही थे।

— प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh