दहेज के पंख
शादी के दिन रेखा को उसके मायके से एक बड़ी सी ट्रॉली मिली — बर्तन, गहने, कपड़े। सास ने कहा — “अच्छा है, कुछ बोझ तो हल्का हो गया।”
रेखा को लगा वह उड़ने आई थी, पर यहाँ तो पंखों पर बोझ था। हर उपहार उसकी योग्यता से बड़ा हो गया था।
एक दिन उसने नौकरी की बात की, तो जवाब मिला — “जब सबकुछ मिल गया है, तो ज़रूरत क्या है?”
रेखा ने कहा — “मुझे उड़ना है, दिखावा नहीं।”
वह ट्रॉली को छोड़, अपनी डिग्री लेकर निकल पड़ी — असली पंख वही थे।
— प्रियंका सौरभ
