कविता

बरसते मेघों की पुकार

बरस रहे हैं मेघ ,
तड़प रही हूँ मैं ,
भीगनें को दिल चाहता है,
रोक न पाऊँगी ख़ुद को ,
तुमसे मिलने जी करता है।

आकर देखो अपने द्वार पर ,
बागों में मोर नाच रहा ,
पक्षियों का कलरव हो रहा ,
रोक न पाओगे ख़ुद को ,
मुझसे मिलने को मन करेगा।

आनेवाला है सावन ,
अभी से धानी चुनरिया ओढ़कर,
पलकें बिछा के रखी हूँ,
आना होगा तुम्हें ,
न कोई अब बहाना चलेगा।

मेरा हाल सुनकर,
मेरे प्रियतम!
रोक न पाओगे ख़ूद को,
बरस रहे हैं मेघ
गरज रहा है बादल।

— चेतना सिंह

चेतना सिंह 'चितेरी'

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