बेटियों को सिर्फ संस्कारी नहीं, बल्कि सशक्त, आत्मनिर्भर और जागरूक बनाइए
बेटी जिगर का टुकड़ा है,बेटियां माता-पिता के दिल के बेहद क़रीब होती हैं, उनकी परवरिश में प्यार और सुरक्षा दोनों जरूरी हैं।
आज़ादी जरूरी है,सिर्फ अच्छे संस्कार देना ही काफी नहीं, बेटियों को आज़ादी देना भी उतना ही जरूरी है। उन्हें अपनी पहचान बनाने का मौका मिलना चाहिए।
तितली और मधुमक्खी का उदाहरण, बेटियों को नाजुक तितली की तरह उड़ने की आज़ादी दीजिए, लेकिन साथ ही मधुमक्खी की तरह आत्मरक्षा का हुनर भी सिखाइए, ताकि जरूरत पड़ने पर वे खुद का और अपनी इज्जत का बचाव कर सकें।आज के समय की आवश्यकता,सिर्फ संस्कार नहीं, आत्मनिर्भरता भी है,बेटियों को अच्छे संस्कार देना जरूरी है, लेकिन उन्हें आत्मनिर्भर बनाना उससे भी ज्यादा जरूरी है।
आत्मरक्षा के हुनर,बेटियों को आत्मरक्षा के गुर, आत्मविश्वास, और मुश्किल समय में सही फैसले लेने की क्षमता भी सिखानी चाहिए।सशक्तिकरण,बेटियों को सशक्त बनाइए, ताकि वे समाज में अपने अधिकारों के लिए खड़ी हो सकें। इन बातों का गलत अर्थ निकालना बिल्कुल भी उचित नहीं है। जो कहा गया है वो आज के सामाजिक परिवेश की सच्चाई है। बेटियों को सिर्फ सिखाना ही नहीं, उन्हें मजबूत भी बनाना है, ताकि वे हर परिस्थिति का सामना कर सकें।
समाज को और माता-पिता को यह समझना होगा कि बेटियों को सिर्फ संस्कारी नहीं, बल्कि सशक्त, आत्मनिर्भर और जागरूक बनाना समय की मांग है। आपकी बात को गंभीरता से लेना चाहिए, क्योंकि यही आज के युग की सच्ची आवश्यकता है।
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह
