ग़ज़ल
सजी देख महफ़िल चलो आज गा दें।
मुहब्बत भरी अब ग़ज़ल ही सुना दें।।
महीना यही देख सावन लुभाया।
लगी आग दिल में अभी ही बुझा दें।।
न कोई कभी ग़ैर हो ज़िंदगी में।
हुई जो अभी तो उसे ही हटा दें।।
रहे ग़म न कोई सताये कभी भी।
चलो ख़ुशनुमा आज इसको बना दें।।
ख़ुदा दे रहा आज नेमत हमें ही।
अभी देख झोली सभी की भरा दें।।
छुपाते रहे देख जो दर्द अपना।
गरीबी मिटा हम सहारा सदा दें।।
ज़माना हमें दे रहा साथ अब तो।
अभी देख उससे क़दम हम मिला दें।।
करें माफ़ गलती हुई जो किसी से।
भुला कर सभी ग़म चलो मुस्कुरा दें।।
सुनो प्यार से जो मिले हैं गले ही।
उन्हीं की हक़ीक़त सभी को सुना दें।।
— रवि रश्मि ‘अनुभूति’
