दो बूंद पानी!
आज अंजना बड़े ओहदे वाली थी, उसके घर में पीने को बहुत पानी था और समाज में इज्जत का पानी भी, पर वह उस दिन को कैसे भुला सकती थी, जब दो बूंद पानी की खातिर घंटों लाइन में खड़ा होना पड़ता था, फिर वंदना जैसी मां के मिलने से जैसे वह भगवान की कृपणता को भूल ही गई थी!
झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाली अंजना उस दिन बहुत उदास थी. रोज की तरह वह पानी के लिए बाल्टी लिए टैंकर की राह देख रही थी, स्कूल का टाइम जो हो रहा था!
“हे भगवान, तुम्हें हम पर रहम नहीं आता! इतनी उदारता से मानव जन्म दिया, पानी देने में इतनी कृपणता क्यों?” उसके मुहं से अचानक निकल गया!
“इतने बड़े-बड़े शब्द उदारता, कृपणता कहाँ से सीखी हो?” पास से गुजरती हुई बुजुर्ग महिला वंदना जी ने हैरानी से पूछा.
“कल ही मैम ने विलोम शब्द में सिखाया था, आज पर्यायवाची शब्द सिखाने वाली हैं, पर लगता है आज टाइम पर स्कूल पहुंच ही नहीं पाऊंगी.” अंजना की आवाज में मायूसी थी और भगवान के प्रति तनिक आक्रोश भी!
“मेरा घर पास ही है, आओ वहाँ से पानी भर लो और टाइम से स्कूल पहुंचो बेटी!”
“धन्यवाद मां,” अंजना ने चरण-स्पर्श करते हुए कहा.
वंदना जी ने उसे प्रेम से उठाकर गले लगाकर पूछा “तुम्हारी आंखों में पानी क्यों?”
“सच तो यह है कि पीने के पानी की किल्लत से आंखों का पानी भी सूख गया था, आज इतनी इज्जत से आपके “बेटी” संबोधन ने प्रेम की बरसात कर दी, अब तक तो मैं छोरी ही थी!”
उसके बाद तो दो बूंद पानी ने दो दिल मिला दिए थे! वंदना जी उसके लिए उदार भगवान बन गई थीं.
— लीला तिवानी
