बारूद!
बारूद गलती से जल गया था या जान-बूझकर जलाया गया था, फिलहाल रफ़ीक को वजू के लिए पानी भी नसीब नहीं हो रहा था. किसी तरह एक चटाई मिल गई थी, सो बिना वजू के ही वह नमाज अदा करने लग गया.
पर क्या वह असल में नमाज थी! उसका मन तो परिवार में लगा था. इस बारूद ने न केवल उसका परिवार, बल्कि पूरे गांव को निगल लिया था! पता नहीं वह कैसे बच गया था! गांव में हर जाति-धर्म के लोग थे. फिलहाल तो वह नमाज में यही कह पा रहा था-
“हे मालिक, सबको सुमति दे. इस बरबादी से किसका भला हो रहा है! गांव तो बरबाद हो ही गया, बारूद जलाने वालों को भी मिलेंगे केवल गड्ढे और राख!”
वह फिर नमाज पढ़ने की नाकाम कोशिश में लग गया!
— लीला तिवानी
