लघुकथा

बारूद!

बारूद गलती से जल गया था या जान-बूझकर जलाया गया था, फिलहाल रफ़ीक को वजू के लिए पानी भी नसीब नहीं हो रहा था. किसी तरह एक चटाई मिल गई थी, सो बिना वजू के ही वह नमाज अदा करने लग गया.
पर क्या वह असल में नमाज थी! उसका मन तो परिवार में लगा था. इस बारूद ने न केवल उसका परिवार, बल्कि पूरे गांव को निगल लिया था! पता नहीं वह कैसे बच गया था! गांव में हर जाति-धर्म के लोग थे. फिलहाल तो वह नमाज में यही कह पा रहा था-
“हे मालिक, सबको सुमति दे. इस बरबादी से किसका भला हो रहा है! गांव तो बरबाद हो ही गया, बारूद जलाने वालों को भी मिलेंगे केवल गड्ढे और राख!”
वह फिर नमाज पढ़ने की नाकाम कोशिश में लग गया!

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244