रोटी का जुगाड़!
आज अम्मा बहुत खुश नजर आ रही थी, लेकिन कुछ दिन पहले तक क्या सोच रही थी!
“फसल तो अच्छी हुई है, खेत भी खूबसूरत लग रहे हैं, पर फसल की कटाई और बाजार में पहुंचाई का क्या होगा? मुए कोरोना ने सारे मजदूर भगा दिए!” अम्मा खुश भी थी और नाखुश भी!
“रोटी का जुगाड़ कैसे होगा?” उसकी चिंता थी.
तभी एक बड़ी-सी गाड़ी आकर खड़ी हुई थी.
“अम्मा, क्या सोच रही हो?”
“सोचूंगी क्या बेटा” कहकर अपनी चिंता भी बता दी!
“बस ये समझो अम्मा, पूरे साल तक का रोटी का जुगाड़ हो गया!”
“वो कैसे?” अम्मा की आंखें विस्फारित हो गई थीं.
“बस एक फोटो खींचने दीजिए!”
“खींच ले बचवा!” अम्मा में अपनापन नमूदार हो गया था!
बचवा ने भी अम्मा का पोज़ बनाकर फोटो खींच लिया और उन्हें 11000 रुपये देकर कुछ समय बाद आने का वादा कर चला गया.
अम्मा ग्यारह हजार रुपयों को देखती ही रह गई!
बचवा एक बार फिर आया था और अबकी पूरा एक लाख दे गया था! उसी फोटो पर उसे उस साल का “सर्वश्रेष्ठ विश्व फोटोग्राफर” के सम्मान से सम्मानित किया गया था और 51 लाख का नगद पुरस्कार भी.
अम्मा का हिस्सा तो बनता ही था न! सचमुच रोटी का जुगाड़ हो गया था.
— लीला तिवानी
