कौन कितना है
नहीं जाना है उस राह में
जिससे नहीं है मेरा कोई वास्ता,
ला देते हैं रोड़े राहों में
रोक लेते प्रगति वाला रास्ता,
मस्तिष्क को गिरवी रख कर
हर पल उलझे रहते हैं,
हवाबाजी की बातें बता
खुद को ज्यादा सुलझे कहते हैं,
राहें आदमी को कहीं नहीं ले जाती
लोग खुद ही राह बनाते हैं,
सफल हो जाने वाला
सबको एक अलग मंजिल दिखाते हैं,
चालाक व्यक्ति एक ऐसा
वातावरण बनाना चाहता है,
मकड़ी की जालों में फंसे हुए कीटों की तरह
कसमसा कर बैठे लोगों को
उलझाकर एक अलग राह दिखा
बैठे बैठे ताउम्र खाना चाहते हैं,
सब लगे हैं एक दूसरे को उलझाने में,
खुद को समझदार दिखाने में,
लेकिन समझदार वही है जो
उनकी सहमति से उन्हें लुटे,
विनम्रता से सब समर्पित कर कहे
अभी तक हमारे भाग थे फूटे,
आज हिदायतें लगने लगा है बकबक,
पता नहीं चलता है कौन कितना अहमक।
— राजेन्द्र लाहिरी
