उपन्यास अंश

लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 3)

अवध से केकय तक का सारा मार्ग उन दूतों द्वारा देखा हुआ था। वे वहाँ पहले भी जा चुके थे। उन्होंने रक्षों के चलने योग्य सुगम मार्ग के स्थान पर जंगलों और पहाड़ों से भरा हुआ सीधा और कठिन मार्ग पकड़ा। सुगम मार्ग से पहुँचने में अधिक दूरी तय करनी पड़ती थी, जबकि कठिन मार्ग से वे बहुत जल्दी पहुँव सकते थे। कठिन मार्गों पर घोड़े भी सरलता से दौड़ाये जा सकते हैं।

पर्वतों की तलहटी में बहने वाली मालिनी नदी के किनारे होते हुए वे आगे बढ़े और तेजी से चलते हुए पांचाल राज्य में प्रवेश कर गये। उस राज्य के बीच से होते हुए उन्होंने कुरु जांगल प्रदेश में प्रवेश किया और हस्तिनापुर के पास से गंगा नदी पार की। वहाँ से सीधे पश्चिम दिशा में वे वेगपूर्वक बढ़ते गये। उन्होंने अनेक रमणीय सरोवरों और नदियों के दर्शन किये, परन्तु कहीं भी रुके बिना चलते गये।

कुरुपांचाल प्रदेश से आगे चलकर उन्होंने पंचनद प्रदेश में प्रवेश किया और विपाशा व्यास नदी को पार किया। उनके घोड़े बहुत थक गये थे, इसलिए रात्रि होने पर उन्होंने एक सुरक्षित स्थान पर रात्रि विश्राम किया और प्रातः होने पर फिर निकल पड़े। वे वेगपूर्वक अपने गंतव्य की ओर चलते गये और अगले ही दिन रात्रि होने से पूर्व ही वे केकय देश की राजधानी राजगृह में प्रवेश कर गये। मार्ग लम्बा होते हुए भी बाधाहीन था, इसलिए उसे पार करने में उनको कोई विशेष कष्ट नहीं हुआ।

जिस दिन अयोध्या से भेजे गए दूत राजगृह नगरी में पहुँचे, उससे पहले की रात्रि को राजकुमार भरत ने एक बहुत बुरा सपना देखा। उन्होंने देखा था कि उनके पिताजी एक गधे जुते हुए रथ पर सवार होकर दक्षिण दिशा में जा रहे हैं। उन्होंने और भी अनेक बुरे स्वप्न देखे। इनसे उनको निश्चय हो गया कि अयोध्या में कोई अशुभ घटना घटी है। यह सोचकर वे बहुत उदास हो गये।

भरत जी के मित्रों ने उनकी उदासी दूर करने के लिए आमोद-प्रमोद का आयोजन किया, परन्तु वे प्रसन्न नहीं हुए। बहुत पूछने पर उन्होंने मित्रों को अपने स्वप्न के बारे में बताया। वे मित्र उनको अनेक प्रकार से सांत्वना देने लगे। तभी अयोध्या के दूत वहाँ पहुँच गये।

राजमहल के द्वार पर पहुँचकर दूतों ने द्वारपाल से कहा- ”हम सभी अयोध्या से आये हुए दूत हैं। अपने महाराज को हमारे आने की सूचना दे दो।“ द्वारपाल ने जाकर महाराज को सूचना दी, तो उन्होंने अयोध्या से आये दूतों को तत्काल बुलवा लिया। दूतों ने आकर उनको अभिवादन किया। प्रधान दूत सिद्धार्थ ने कहा- ”महाराज, हम अयोध्या से राजकुमार भरत जी के लिए सन्देश लेकर आये हैं।“

केकयराज ने पूछा- ”अयोध्या में सब कुशलमंगल तो है न?“

सिद्धार्थ- ”हाँ महाराज! सब कुशलमंगल हैं।“ इससे महाराज प्रसन्न हो गये। फिर उन्होंने अपने मंत्री से कहा- ”मंत्रिवर! इनको राजकुमार भरत से मिलवा दीजिए और इनके विश्राम की व्यवस्था कर दीजिए।“

”जो आज्ञा महाराज की!“ कहकर मंत्री उन दूतों को अपने साथ भरत जी के पास ले गये। भरत जी ने देखते ही दूतों को पहचान लिया। दूतों ने उनका अभिवादन किया, तो वे बोले- ”सिद्धार्थ! विजय! तुम यहाँ! क्या समाचार है? अयोध्या में सब कुशलमंगल तो है? मेरे पिताजी, तीनों माताएँ और भाई श्री राम और लक्ष्मण कुशलता से तो हैं?“

सिद्धार्थ ने विनम्रता से कहा- ”सब कुशल हैं राजकुमार! आपको गुरुदेव वशिष्ठ जी ने तत्काल अयोध्या आने का सन्देश भेजा है। हम महाराज और युवराज के लिए भेंट भी लेकर आये हैं।“ यह कहकर दूतों ने अपने साथ लायी हुई बहुमूल्य वस्तुएँ केकय देश के राजा और युवराज को भेंट देने के लिए भरत जी को दे दीं। भरत जी ने उन वस्तुओं को ग्रहण करके पूछा- ”अचानक मुझे बुलाने का कारण क्या है?“

सिद्धार्थ- ”कारण हमें नहीं पता, राजकुमार! आपको तुरन्त ले आने के लिए कहा है। इसलिए शीघ्र चलिए।”
भरत जी- ”ठीक है! मैं कल प्रातःकाल ही चलूँगा। नाना जी को सूचना दे देता हूँ। तुम सब लोग थके हुए हो। रात्रि में विश्राम कीजिए।“ यह कहकर भरत जी अपने नाना और नानी से भेंट करने चले गये। इधर मंत्री ने दूतों को अतिथिगृह में पहुँचाकर उनके विश्राम की व्यवस्था कर दी।

— डॉ. विजय कुमार सिंघल
श्रावण कृ. 6, सं. 2082 वि. (16 जुलाई, 2025)

डॉ. विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com