कविता

मैं भी व्रत हूँ

झूले की डोरी से उलझे हैं प्रश्न,
हर सावन में मैं स्वयं से टकराती हूँ।
मेंहदी रचती हूँ हथेली पर,
पर हथेली खुद अधूरी रह जाती है।

घेवर की मिठास में छुपा है स्वाद
उस वचन का,
जो अब तक न लौटा
मेरे नाम के दीप संग।

सास की आँखों में है शगुन,
पर उसमें प्रेम नहीं —
केवल परंपरा का आवरण
जो मेरी साँसों पर चढ़ा है।

हरियाली है चारों ओर,
पर मेरे भीतर सावन रूखा है।
कदंब के नीचे जो झूला पड़ा है,
वो मेरा नहीं — किसी और की प्रतीक्षा करता है।

तू आए या न आए,
मैं हर साल
तेरी यादों की पूजा करती हूँ।
हर व्रत, एक कहानी है
जो सुनाई नहीं जाती —
बस आँखों से टपकती है।

मैं भी एक व्रत हूँ,
जो हर स्त्री के भीतर
चुपचाप चलता है —
बिना फल की आशा के,
सिर्फ ऋतु की मर्यादा में बंधा।

— प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh