सत्संग
चलो रोज थोड़ी देर सत्संग कर लें
करुणा, दया भाव दिल में भर लें
प्रेम के सागर में डुबकी लगाकर
पवित्रता ह्रदय में भर लें।।
नकारात्मकता मन में आने न दें
धैर्य व साहस ह्रदय में समा लें
छुट-पुट समस्याएं हंसकर झेलेंगे
आत्मविश्वास से मन भर लें।।
अच्छे विचार ही संग ले जाएं
दुर्भावनाओं की होली जलाएं
ऊंच-नीच का सब भेद तजकर
अन्तःकरण को निर्मल कर लें।।
कुछ नया करने की मन में ठाने
स्वयं को अच्छे से, जाने-पहचाने
कुछ देर स्वयं से बातें करके
उर में आनंद ही आनंद भर लें।।
झुक कर चलने में है छुपा बड़प्पन
मेल-जोल से है बढ़ता अपनापन
वाणी पर नियंत्रण अत्यंत जरूरी
कटु शब्दों पर लगाम धर लें।।
चित्त की शुद्धि पर ध्यान लगाएं
शीघ्रातिशीघ्र मन का मैल मिटाएं
कमियां निकालने से बेहतर है
निज सुधार की ओर कदम भर लें
हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा
धीरे-धीरे ही वातावरण बदलेगा
मार्ग में अवरोध तो तमाम आएंगे
विचलित न हों थोड़ा धीरज धर लें
धैर्य से काम लेना पड़ेगा
धीरे-धीरे ही पौधा वटवृक्ष बनेगा
सब्र का फल सदा मीठा होता
छोटी सी बात का पालन कर लें।।
सत्संग का असर अति मंगलकारी
महक उठेगी मन की हर क्यारी
संगत का प्रभाव तो पड़ कर रहेगा
नवचेतना तू प्राणों में भर ले।।
चलो रोज थोड़ी देर सत्संग कर लें
करुणा, दया, भाव दिल में भर लें
प्रेम के सागर में डुबकी लगाकर
पवित्रता ह्रदय में भर लें ।।
— नवल अग्रवाल
