अभी सावन बरसता है, हर पत्ता हरा तेरा
खिज़ा में सदा अपनी, लगा के देख लेना तुम
हिज्र में कभी मुझको, बुला के देख लेना तुम
अभी सावन बरसता है, हर पत्ता हरा तेरा
बहारों से यहाँ अभी, है दामन भरा तेरा
वक्त हो या शख्स, फितरत बदलना है –
पतझड़ में कभी, आजमा के देख लेना तुम
राहों पे अब यहाँ, रहनुमा नही मिलते
सैय्याद मिलते हैं, सूरमा नही मिलते
साहिल पे सहारे बहुत, मिल ही जाते हैं –
मझधार में कभी, बुला के देख लेना तुम
अभी पूनम की रातें हैं, दिन भी सुनहरे हैं
चमकने वालो के बड़े, यहाँ ‘राज’ गहरे हैं
जेठ की दोपहर अभी, तपना यहाँ बाकी –
शैलाब में भी हाथ, उठा के देख लेना तुम
- राज कुमार तिवारी “राज”
