कहानी

बाबा ने मकान की वसीयत वृद्धा आश्रम के नाम कर दी

बाबा नौकरी में थे। जब तक कमाते रहे, बेटा-बहू बड़ा अच्छा व्यवहार करते थे, पूछ-पूछकर खाना देते, हाल-चाल पूछते, सब साथ-साथ बैठते। फिर एक दिन बाबा ने कहा, “बेटा, मैं चाहता हूं कि इस पुराने मकान को तोड़कर एक अच्छा सा नया मकान बनवा लो, ताकि तुम सब अच्छे से रह सको, मुझे भी थोड़ा सुकून और आराम मिल सके।”
बेटे और बहू को भी ये सुझाव अच्छा लगा। मकान के लिए पैसे बाबा ने दिए। बड़ी कोशिशों के बाद मकान बनकर तैयार हो गया,हर एक के लिए अलग-अलग कमरे, अलग किचन, हॉल, बालकनी, सब कुछ। सबके अपने हिस्से बंट गए, बेटा-बहू खुश, बच्चों को भी अपने अलग कमरे मिल गए।
मकान की ओपनिंग भी धूमधाम से हुई। बेटे के दोस्त आए, रिश्तेदार भी आए, बधाइयाँ दीं। लेकिन बाबा एक कोने में खामोशी से बैठे रहे। नई ईंटों और रंगीन दीवारों के बीच उनकी पुरानी यादें कहीं खो गईं।
धीरे-धीरे घर के हालात बदलने लगे। बेटे-बहू का व्यवहार पहले जैसा नहीं रहा। बड़ों का लिहाज, वो अपनापन गायब-सा हो गया। अब बाबा से ज्यादा कोई सरोकार न था।
एक दिन बाबा ने बेटे से पूछ ही लिया, “बेटा, मेरा कमरा कौनसा है? मुझे वहां शिफ्ट कर दो, उम्र हो गई है, अपनी जगह चाहिए।” बेटा और बहू अब पहले जैसे नहीं थे। बहू बोली, “बाबा, आपको अब अलग कमरे की क्या जरूरत है? इतना बड़ा हॉल है, वहीं किसी भी सोफे पर सो जाया करो।” बेटे ने भी हामी भर दी।
बाबा के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। आंखों में आंसू भरकर, खामोश हो गए मगर स्वाभिमान अभी भी जिंदा था। अब वो घर में ना के बराबर बोलते, सब कुछ चुपचाप सहते रहे। एक दिन सबने देखा कि बाबा घर छोड़कर कहीं चले गए। किसी ने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की, ना ढूंढ़ने की।
कुछ ही दिनों बाद कुछ लोग आए, उनके हाथ में कागज थे, उन्होंने बताया कि बाबा ने अपने मकान की वसीयत वृद्धा आश्रम के नाम कर दी है। अब, बेटे-बहू को मकान खाली करना होगा।
पति-पत्नी एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। अब बाबा कहीं नजर नहीं आ रहे थे। बस उनकी दी हुई छांव, यादें, और वो जज़्बात रह गए थे एक दिन सब ‘अपना’ होते-होते, ‘पराया’ हो जाता है।
इस अफ़साने से ये सीख मिलती है कि जो लोग अपने माता-पिता की कद्र नहीं करते, वे जीवन में भले ही सब कुछ पा लें, लेकिन असली सुकून और बरकत खो देते हैं। माता-पिता की दुआओं और उनका साथ ही जीवन की सबसे बड़ी दौलत होती है।

— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।