कितना रोये होंगे वह पेड़
कितना रोये होंगे वह सेव से लदे पेड़
जब चली होगी विभाग की उनपर कुल्हाड़ी
क्या कसूर था उनका यदि सरकारी जमीन पर थे
जब लगाए थे तब किसकी गई थी मति मारी
गिरने से पहले सोचते होंगे
मानव कितना बड़ा है अत्याचारी
छोटे छोटे बच्चों की तरह थे लटके सेव
अपने बच्चों की याद नहीं आई कैसे चलाई होगी आरी
क्यों काटना जरूरी था उनको इसलिए कि अतिक्रमण था
और नहीं तो फलों को तो तोड़कर कर देते किनारे
भूख से बिलबिलाते नन्हें बच्चों को ही खिला देते
पेट भर जाता मिल जाते उनको सहारे
कहते हैं पेड़ लगाने हैं पर्यावरण है बचाना
काट दिए उन्होंने हरे पेड़ जिनका काम था लगाना
कोई कुछ नहीं कर सका न्यायालय के आगे
कोई युक्ति काम न आई कैसे था इनको बचाना
पेड़ को तो उगना था जमीन निजी होती या सरकारी
जब लगाये थे पौधे तब क्यों नहीं थी विभाग को जानकारी
फलों से लदे पेड़ों को काटना बहुत बड़ा है पाप
आने वाले समय में यह हो सकता है विनाशकारी
— रवींद्र कुमार शर्मा
