उपन्यास अंश

लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 7)

अपनी बड़ी माता महारानी कौशल्या के पास जाने से पहले भरत जी कैकेयी को फिर फटकारने लगे- ”क्रूरहृदया दुष्टा कैकेयी! मैं तेरा त्याग करता हूँ। तू इस राज्य से भ्रष्ट हो जा। तू पत्नीधर्म से गिर चुकी है, इसलिए अब महाराज के लिए रोना मत। अब तू मुझे मरा हुआ समझकर अपने पुत्र के लिए रोती रहना। श्री राम या मेरे अत्यन्त धर्मात्मा पिताजी ने तेरा क्या बिगाड़ा था कि तूने उनको वनवास और मृत्यु का कष्ट दिया। इसके लिए तुझे नरक में ही स्थान मिलेगा।

राज्य के लोभ में पड़कर क्रूरतापूर्ण कार्य करनेवाली दुराचारिणी कैकेयी! तू माता के रूप में मेरी शत्रु है। तुझे मुझसे बात नहीं करनी चाहिए। तू धर्मराज अश्वपति की पुत्री नहीं है। तू उनके कुल में राक्षसी पैदा हो गयी है, जो मेरे पिता के वंश का विध्वंश करने यहाँ आ गयी है। अब श्री राम ही मेरे पिता हैं और माता कौशल्या तथा सुमित्रा ही मेरी माताएँ हैं।

तूने सती साध्वी कौशल्या का उनके पुत्र से विछोह करा दिया है। इसके लिए तू सदा इस लोक और परलोक में भी दुःख पायेगी। मैं यह राज्य बड़े भैया को लौटाकर उनकी पूजा करूँगा और पिताजी का भी अन्तिम संस्कार करके उनकी पूजा करूँगा। मैं वह सब करूँगा जिससे मेरे ऊपर तेरे द्वारा लगाया गया यह कलंक मिट जाये और मेरा यश बढ़े। तेरे किये हुए इस पाप का बोझ मैं ढोता रहूँ, यह नहीं हो सकता।

अब इस लोक में तेरे लिए कोई स्थान नहीं है। अब तु चाहे आग में जल जा, या रस्सी पर लटककर प्राण दे दे या दण्डकारण्य को चली जा। जब श्री राम पुनः इस अवध में चरण धरेंगे, तभी मेरा कलंक दूर होगा।“ यह कहकर भरत फिर शोक से पीडित होकर विलाप करने लगे।

कुछ देर तक विलाप करने के बाद उठकर उन्होंने आस-पास एकत्र हो गये मन्त्रियों से कहा- ”मन्त्रिवरो! मैं राज्य नहीं चाहता और न मैंने माता से इसके लिए वार्ता की है। महाराज ने किसके अभिषेक का निश्चय किया था, मुझे इसका कोई ज्ञान नहीं था, क्योंकि मैं शत्रुघ्न के साथ दूर देश में था। श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण जी का वनवास होने का भी मुझे कोई ज्ञान नहीं है कि यह कब, कैसे और क्यों हुआ। इसलिए मैं इस राज्य को अस्वीकार करता हूँ। यह राज्य श्री राम का है और उनको ही दिया जाना चाहिए।“ यह कहकर वे बड़ी माता कौशल्या से मिलने के लिए चलने लगे। उनके साथ शत्रुघ्न भी थे।

जब भरत जी अपनी माता कैकेयी को फटकार रहे थे और विलाप कर रहे थे, तो उनकी आवाज़ को सुनकर महारानी कौशल्या ने सुमित्रा जी से कहा- “लगता है कि क्रूरकर्म करनेवाली कैकेयी के पुत्र भरत आ गये हैं। मैं उनको देखना चाहती हूँ।” यह कहकर अन्यन्त उदास मुख लेकर वे कैकेयी के महल की ओर चलीं, लेकिन तभी उन्होंने दूर से भरत जी और शत्रुघ्न जी को आते हुए देख लिया। वे दुःखी होकर पृथ्वी पर गिर पड़ीं।

कौशल्या को भूमि पर गिरते देखकर भरत जी और शत्रुघ्न जी दौड़कर उनके पास आये और उनकी गोदी से लग गये और रोने लगे। कौशल्या जी ने उनको अपनी छाती से चिपका लिया और रोते हुए कहा- “बेटा! तुम राज्य चाहते थे, वह तुम्हें मिल गया। तुम इस धन-धान्य से भरे हुए राज्य का पालन करो, जो कैकेयी ने तुम्हें दिलाया है। अब मैं और सुमित्रा वन में श्री राम के पास ही जायेंगी। तुम हमें वहीं पहुँचा दो।” इस तरह बहुत सी बातें कहकर कौशल्या जी विलाप करने लगीं।

कौशल्या जी के मुख से ये बातें सुनकर भरत जी को बहुत पीड़ा हुई। वे रोते हुए कौशल्या के चरणों में गिर पड़े और विलाप करने लगे। रोते-रोते वे हाथ जोड़कर माता कौशल्या से कहने लगे- “माँ! यहाँ जो कुछ हुआ है उसका मुझे कोई ज्ञान नहीं था। यदि मेरी सम्मति से यह हुआ हो, तो मुझे घोर पाप लगे। मैं शपथ खाकर कहता हूँ कि इसमें मेरी सम्मति नहीं थी।

यदि मेरी सलाह से बड़े भैया को वन में जाना पड़ा हो, तो मुझे वही पाप लगे, जो यज्ञ के बाद ऋत्विजों को वचन देकर भी दक्षिणा न देनेवालों को लगता है। यदि मेरी सम्मति से यह हुआ हो, तो मुझे वही पाप लगे, जो संग्राम में अपने धर्म का पालन न करनेवाले योद्धाओं को लगता है। यदि मेरे कारण श्री राम को वन में जाना पड़ा हो, तो मुझे सभी तरह के पापों का दण्ड मिले।“ इस प्रकार वे इस कार्य में अपनी सम्मति न होने का विश्वास कौशल्या को दिलाने लगे।

जब भरत जी अनेक प्रकार से अपनी सफ़ाई दे रहे थे, तो कौशल्या जी को विश्वास हो गया कि इसमें भरत जी का कोई दोष नहीं था, बल्कि यह कैकेयी की अपनी करतूत थी। इसलिए उन्होंने भरत जी को अपने हृदय से लगा लिया और फूट-फूटकर रोने लगीं और कहने लगीं- ”पुत्र! यह सौभाग्य की बात है कि तुम्हारा चित्त धर्म से विचलित नहीं हुआ है। तुम सत्य पर दृढ़ रहनेवाले हो, इसलिए तुम्हें सभी पुण्यलोकों की प्राप्ति होगी।“ यह कहकर वे फिर भरत जी को हृदय से लगाकर रोने लगीं। इस प्रकार रोते और बातें करते हुए उनकी सारी रात बीत गयी।

— डॉ. विजय कुमार सिंघल
श्रावण अमावस्या, सं. 2082 वि. (24 जुलाई, 2025)

डॉ. विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com