ग़ज़ल
भुला कर हर बात, मन को हल्का कर लिया जाए,
हल्का होकर मन चाहे तो, उसे उड़ने दिया जाए।
खुशी की खबरों से, मन को उत्तेजित क्या करना,
दो पल खुश रहकर ही, मुस्कुराकर खुश रहा जाए।
दुःख भी आते-जाते रहते हैं, मन को क्रोधित क्या करना,
समय-चक्र की नियति मान, सहज होकर जिया जाए।
ताने दे-दे सीना छलनी कर देते हैं, पल-पल दुनिया वाले,
क्या कहेंगे लोग को सबसे बड़ा रोग समझ, भुला दिया जाए।
समय आने पर आती हैं बहारें भी, मन को महका जाती हैं,
पतझड़ का अपना रंग होता है, उसका भी स्वागत किया जाए।
आने दो लहरों को भी किनारे तक, मंजिल है वह उनकी,
मझधार के सुरक्षा-सबक को भी, सहर्ष सीख लिया जाए।
— लीला तिवानी
