कविता

विरह की ज्वाला

सावन बरसे, मनवा तरसे,
सजना तुम अब तक नहीं आए,
रिमझिम-रिमझिम बुंदियां बरसें,
बरसे बदरिया, तनिक न भाए।

कुछ श्रृंगार भी रास न आए,
क्या झुमके क्या मेंहदी-माला,
शीतल रिमझिम बुझा न पाए,
मेरे हृदय में विरह की ज्वाला!

याद तुम्हारी निशिदिन आती,
कासे कहूं पीर पिया मन की,
पेंग बढ़ाएं सखियां संग पिया,
मैं सुध भूली पिया तन-मन की!

स्वाति बूंद से तुष्ट पपीहरा,
जाने कब मेरी प्यास बुझेगी,
आस लगाए बैठी हूँ मन में,
खुशियों की फिर लहर उठेगी!

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244