विरह की ज्वाला
सावन बरसे, मनवा तरसे,
सजना तुम अब तक नहीं आए,
रिमझिम-रिमझिम बुंदियां बरसें,
बरसे बदरिया, तनिक न भाए।
कुछ श्रृंगार भी रास न आए,
क्या झुमके क्या मेंहदी-माला,
शीतल रिमझिम बुझा न पाए,
मेरे हृदय में विरह की ज्वाला!
याद तुम्हारी निशिदिन आती,
कासे कहूं पीर पिया मन की,
पेंग बढ़ाएं सखियां संग पिया,
मैं सुध भूली पिया तन-मन की!
स्वाति बूंद से तुष्ट पपीहरा,
जाने कब मेरी प्यास बुझेगी,
आस लगाए बैठी हूँ मन में,
खुशियों की फिर लहर उठेगी!
— लीला तिवानी
