गजल
कितने काम अधुरे कितने वादे बाकी
जाने मेरा वक्त बचा अब कितना बाकी ।
सारा जीवन बँधा रहा एक मोहपाश में
देख चुका दुनिया अब खुद को देखना बाकी ।
अगनित प्याले मधु के रिते कर डाले हैं
फिर भी लुभाता मैखाने में बैठा साकी ।
कितने मेले जलसे ,कितने सुख दुख देखे
आया वक्त आखरी फीकी होती झाँकी ।
जिसने जो भी किया गिला ना कोई शिकवा
नहीं उजागर किया , सभी की बातें ढाँकी ।
हंस देता हूँ अपनो की नादानी पर मैं
समझ ना पाये मुझको मेरी क्षमता ना आंकी ।
सारे रिश्ते धीमे धीमे शुष्क हो चले
लेSSकिन अब भी ताजा है क्यूँ यादें माँ की ।
— महेश शर्मा
