ग़ज़ल
धुंध भरी रेत पर आंसूओं का बिछौना है
कोई नहीं तेरा साथी अकेले ही चलते जाना है
क्यों करें हम किसी का इतंजार हर रोज
जिंदगी का क्या पता कब चले जाना है
सुबह की धूप जैसा है ये जिंदगी का सफर
सूरज ढलते ही प्रीतम के घर चले जाना है
आसमान से आती है हर रोज कुछ आवाजें
सुरों की ताल पर बस तुझे चलते जाना है
खनकती है हँसी यहाँ हवाओं के भी चलने से
आँधियों के जवाब में तुझे हौसला दिखाना है
मत कर अपने दिल को तू उदास ओ प्रेम के राही
जिंदगी का मकसद सबकी उम्मीदों को जगाना है
— वर्षा वार्ष्णेय
