फिर कभी न आये ऐसी बरसात
उम्र के उस पड़ाव पर छूट गया अपनों का साथ
जब जरूरत थी बढ़ापे में दोगे सहारा थाम लोगे हाथ
क्या कसूर था माली का जिसने खून पसीने से सींचा था
कैसे जियेगा माली जब खाली हो गए दोनों हाथ
सो रहे थे सब रात को मीठी नींद थी पड़ी
आफत ने आ घेरा मुश्किल की थी घड़ी
ऐसा बरसा मेघ की सब उजड़ गया
किसी को नज़र नहीं आई मौत कहाँ थी खड़ी
किसको पुकारें किसको आवाज़ दे
कोई नहीं सुन रहा मेरी पुकार
मुझे भी ले जाते साथ क्यों रह गयी अकेली
कैसे जियूंगी तुम बिन कभी खत्म न होगा अब ईंतज़ार
विधाता का लिखा कोई मिटा नहीं सकता
जितना लिखा है उससे ज़्यादा कोई रिश्ता निभा नहीं सकता
लाख आवाजें लगा ले कोई जितना मर्जी चिल्ला ले
एक बार जो चला गया वह वापिस आ नहीं सकता
कैसे रहूंगी घर में अकेली किससे करूंगी अब बात
किसको ज़ख्म दिखाऊँ किसको सुनाऊं दिल के जज़्बात
जीना तो पड़ेगा कोई किसी के साथ नहीं जाता
दिल को दिए जख्म जिसने फिर कभी न आये ऐसी बरसात
— रवींद्र कुमार शर्मा
