कार्यों के वर्गीकरण का आधार योग्यता हो
वर्तमान समय में गैर सरकारी संस्था, मल्टीनेषनल कम्पनीज एवं कॉपरेट सेक्टर में नौकरी करना बहुत ही मुश्किल हो गया है। इन संस्थाओं में कार्यों की अधिकता के चलते हुए कार्यरत कर्मचारी प्रायः बहुत ही बेचैन एवं अवसाद से भरे नजर आते हैं। यह देखा गया है कि वहाँ का प्रत्येक कर्मचारी इतना व्यस्त है कि उसके पास समय ही नहीं है। जब उससे पूछा जाए कि आप यहाँ क्या करते हो तो उसके पास कोई मुकम्मल जवाब ही नहीं होता। उसके बावजूद भी वो अपने आपको बहुत व्यस्त कहता है। कुछ तो ऐसा जाहिर करते हैं कि मैं तो फलाफला संस्था अथवा कम्पनी में कार्यरत हूँ और वहाँ पर मेरे पास अत्यधिक कार्य है। जब इसका पता लगाया जाए तो उसके पास कोई विशेष कार्य या यूँ कहें कि कोई प्रभावी अथवा योग्यतानुसार कार्य होता ही नहीं है।
ऐसे व्यक्ति को संस्था में किसी प्रभावशाली व्यक्ति की सिफारिश, रिश्तेदारी या उसके कम वेतन पर कार्य करने की स्वीकृति पर रख लिया जाता है। हाँ, एक बात ओर है कि ऐसे प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक विशेष कला होती है और वो उनके आचरण एवं व्यवहार से झलकती भी है। हम सभी परिचित हैं उनकी इस कला से और वो है चापलुसी अथवा खुशामद करना। इनका सिर्फ और सिर्फ एक ही काम होता है कि अपने बॉस के आसपास रहे ताकि उनकी कृपा दृश्टि सदैव उन पर बनी रहें। उनको ऐसा लगता है कि ऐसा करने से बॉस सदैव उन पर मेहरबान रहेगा।
ऐसे व्यक्तियों के होने की वजह से ही योग्य एवं निष्ठावान व्यक्तियों की संस्था में कदर नहीं होती है। इनकी वजह से ही योग्य व्यक्ति अपने आपको डरा हुआ महसूस करता है। योग्य व्यक्ति के बारे में कहा जाता है कि जो सीमित संसाधनों में भी कुछ नया करिश्मा करके दिखा सकता है और वहीं अयोग्य व्यक्ति अनेक साधनों के बीच में भी कुछ विशेष नहीं कर पाता।
मेरा ऐसा मानना है कि अलग-अलग संस्थाओं का किसी भी कार्य को करवाने का अपना-अपना तरीका होता है। लेकिन प्रबन्धकों को सदैव यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि हमारे अधीनस्थ कार्य करने वाले कर्मचारी हमारे अपने हैं एवं हम सभी एक परिवार की तरह ही है। प्रत्येक कर्मचारी की सुख-सुविधाएँ (जहाँ तक आवश्यक हो), आत्म-सम्मान (सही-सही आंकलन के साथ), कार्य करने की स्वतन्त्रता (अनुशासन के साथ विश्वास), उचित वेतन (आर्थिक स्पर्धा के युग में योग्यतानुसार एक निश्चित मापदण्ड के साथ) एवं अंत में रोजगार की सुरक्षा। ऐसी और भी न जाने अनेकों समस्याओं का सही-सही आकलन कर एवं उनका उचित समाधान निकाल कर रोजगार की सुरक्षा के भय से भी उन्हें मुक्त रखा जाना चाहिए। कहा जाता है कि जब तक सेवा देने वाले कर्मचारियों की भावना, उनके कार्य करने की क्षमता एवं उनकी कार्य के प्रति समर्पण के भावों का आदर नहीं किया जायेगा तब तक किसी भी संस्था को सही दिशा में ले जाना बहुत ही कठिन होगा। इन सभी के लिए प्रबन्धकों में सद्भावना, करुणाभाव, विवेकशीलता, सामजस्य एवं व्यापक दृष्टिकोण के भावों का होना बहुत आवश्यक है।
उपर्युक्त सभी बातों के न होने के कारण आज कुशल कर्मचारियों की योग्यता, प्रतिभा एवं क्षमताओं का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है। उनकी षंकाओं का भी उचित समाधान नहीं हो पाता। सही तरीके से कार्य करना भी उन्हें भार स्वरूप प्रतीत होता है। अपने कार्यो के प्रति जितनी उमंग, कार्य के प्रति रुचि, उत्साह, सजगता एवं सतर्कता उनमें होनी चाहिये, प्रायः अब देखने को नहीं मिलती। इसी मनोस्थिति के चलते हुए कोई भी कर्मचारी अपने आसपास बुरा होता हुआ देखते हुए भी मात्र मनोबल के अभाव अथवा डर के मारे बुराई को बुरा कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। उसकी दुविधाओं, भावनाओं एवं मनःस्थिति को समझने का समय प्रबन्धकों के पास होता ही नहीं है।
अंत में यही कहना चाहूँगा कि किसी भी संस्था में कार्यरत कर्मचारियों के अपने-अपने गुण एवं योग्यताएँ होती है। एक व्यक्ति किसी एक कार्य में योग्य या निपुण होता है तो दूसरा किसी दूसरे कार्य में। व्यक्ति की योग्यता के अनुसार ही उसे कार्य या जिम्मेदारी दी जानी चाहिये, जिससे समय और श्रम दोनों की बचत हो सके। कार्यों की अधिकता इतनी भी नहीं हो कि सौंपा हुआ प्रत्येक कार्य उसे भार स्वरूप प्रतीत हो। साथ-ही-साथ उसके कार्यों का सही आकलन कर समय-समय पर उसके कार्यों के लिए सम्मानित भी किया जाना चाहिए। उसकी कार्यप्रणाली में सहयोगी बनकर उसे तनाव मुक्त रह कर कार्य करने हेतु प्रेरित किया जाना चाहिए। बुद्धिजीवी वर्ग हमेशा कहते है कि जहाँ विनय, विवेक एवं संतोश है, वहाँ तनाव रह ही नहीं सकता। लेकिन जहाँ पर भी इन गुणों का जितना अभाव होगा उतना ही व्यक्ति तनावग्रस्त रहेगा और जो तनावग्रस्त होगा वह बाह्य एवं आन्तरिक रूप से अपने कर्तव्य के मार्ग से भटक जायेगा।
— राजीव नेपालिया (माथुर)
