ग़ज़ल
किसी के ग़म मिटा पाता,
कि तब तू और मुस्काता।
तू चाहे खाता ना खाता,
मगर बूढ़ी से फल लाता।
नहीं है छुट्टा ये कहकर,
उसे कुछ और दे आता।
कि रखते वक़्त पैसों को,
तू उसका हाथ सहलाता।
फटी धोती पे बूढ़ी की,
नज़र में अश्क भर लाता।
अगर बूढ़ी को मां कहता ,
तो उसका चेहरा खिल जाता।
तू बातें करके बूढ़ी से,
कि उसके दिल को बहलाता।
पिता जो मुझसे कहते थे,
वो बच्चे से हूं दुहराता।
पिता गर ज़िंदा होते तो,
उन्हें पोते से मिलवाता।
जो बनता ताल दरया तो,
ये पानी और लहराता।
अगर हम बांट लेते तो,
ये ग़म इतना न तड़पाता।
अगर धीरे चलाते तो,
कोई वाहन न टकराता।
अटकता ना मेरे खाना,
अगर भूका न याद आता।
— अरुण शर्मा साहिबाबादी
