कविता

दो नैना

दो नैना बड़े प्यारे लगते,
जीने के ये सहारे लगते
दो नैना बड़े प्यारे लगते

इन नैनन में चैन बसत है
इनसे ही तो रैन छंटत है
इनसे ही मझधारे कटते
दो नैना बड़े प्यारे लगते

इन नैनों की ज्योति निराली
मन का तम हर लेने वाली
भवसागर के ये किनारे लगते
दो नैना बड़े प्यारे लगते

इनसे ही है जग की माया
इनमें ही है विश्व समाया
ये सृष्टि के धारे लगते
दो नैना बड़े प्यारे लगते

लवी मिश्रा

कोषाधिकारी, लखनऊ,उत्तर प्रदेश गृह जनपद बाराबंकी उत्तर प्रदेश