कविता

नदी नालों की याददाश्त

इंसान ने जब से तरक्की की राह है पकड़ी
नाले तो दूर की बात नदी की राह भी जकड़ी
अपने जाल में फंसाने की कोशिश की नदी नालों को
जैसे पकड़ने के लिए जाल बुनती है मकड़ी

बुजुर्ग कहते थे हमारे नदी नाले
कभी अपनी राह नहीं भूलते
इंसान की तरह बड़ा नहीं समझते
अहंकार में कभी नहीं झूमते

इंसान चला तरक्की की राह पर
संकरे कर दिए नदी नाले खड़े कर दिए मकान
राह रोक दी नदी नालों की क्या कर रहा इंसान
जब आएगी मुसीबत फिर याद आएगा भगवान

एक दिन नदी नालों में जो आ गया
भयंकर बारिश का बहुत पानी
उड़ा दिया जो भी आया उसके रास्ते में
अपना रास्ता व ज़मीन खाली जो थी करवानी

नहीं झेल पाएगा इंसान कुदरत की यह मार
नहीं उठा पायेगा ज़्यादा देर विकास का यह भार
चुकाना तो पड़ेगा मूर्ख इंसान को आखिर
अपनी जिद से जो लिया कुदरत से उधार

मुझसे बड़ा तू नहीं मत कर इतना अहंकार
दूर हो जा मेरे रास्ते से मत मुझको ललकार
तुम्हारी तरह नहीं बदलती रहती मैं रास्ते
मुझे तो है अपने पुराने रास्ते से बहुत प्यार

— रवींद्र कुमार शर्मा

*रवींद्र कुमार शर्मा

घुमारवीं जिला बिलासपुर हि प्र