खट्टा-मीठा : मृतक मतदाता का इंटरव्यू
थका हुआ पत्रकार अपने घर पहुँचा और घरवाली को चाय बनाने का आदेश देकर आरामकुर्सी में धँस गया। वह चाय की प्रतीक्षा कर ही रहा था कि उसके घर के दरवाज़े की घंटी बजी। इस समय कौन हो सकता है यह अनुमान लगाते हुए उसने दरवाज़ा खोला, तो सामने एक अपरिचित व्यक्ति को पाया, जो कफ़न जैसे कपड़े पहने हुए था।
पत्रकार ने उसकी ओर प्रश्नसूचक दृष्टि से देखते हुए पूछा- “आप कौन हैं? यहाँ क्यों आये हैं?”
आगंतुक ने कहा- “मैं मृतक मतदाता हूँ। यहाँ इंटरव्यू देने आया हूँ। आप मेरा इंटरव्यू कर लीजिए।”
“पर मैंने तो आपको बुलाया ही नहीं! इंटरव्यू तो वीआईपी लोगों का किया जाता है। क्या आप कोई वीआईपी हैं?”
“मैं वीआईपी नहीं हूँ। पर आजकल मृतक मतदाता ही वीआईपी बन गये हैं।”
“मृतक मतदाता क्या होता है?”
“जो मतदाता मर चुके होते हैं, परन्तु उनका नाम वोटर लिस्ट में शामिल रहता है, वे ही मृतक मतदाता होते हैं। मैं ऐसा ही हूँ।”
“क्या आप वोट डालते हैं?”
“हाँ। हम हर चुनाव में वोट डालने धरती पर आते हैं। इससे लोकतंत्र मज़बूत होता है।”
“पर आप वोट कैसे डालते हैं?”
“बहुत सरल है। हमारी आत्मा किसी दूसरे व्यक्ति के शरीर में घुस जाती है और वोट डाल आती है। यदि उसकी उँगली पर पहले से स्याही लगी हो, तो वोट डालने से पहले उसे मिटा लेते हैं।”
“अच्छा। इस तरह तो आप देश और लोकतंत्र की बहुत बड़ी सेवा कर रहे हैं।”
“हाँ। पर अब चुनाव आयोग को हमारी यह सेवा अच्छी नहीं लग रही है और उन्होंने हमारे नाम वोटर लिस्ट से काट दिये हैं।”
“ओह ! यह तो बड़ी चिन्ता की बात है।”
“हाँ! चुनाव आयोग हमारे मताधिकार की चोरी कर रहा है। वोट डालना हमारा मरण-सिद्ध अधिकार है। हम इसे लेकर रहेंगे।”
“मैं आपके इस अधिकार का समर्थन करता हूँ।”
“यदि आप मेरा यह इंटरव्यू छाप दें, तो चुनाव आयोग पर दबाव बनेगा और उसे वोटर लिस्ट में हमारे नाम जोड़ने पर मजबूर होना पड़ेगा।”
“अवश्य ! मैं आपका इंटरव्यू ज़रूर छापूँगा।”
“जी धन्यवाद। नमस्ते।”
“नमस्ते!”
— बीजू ब्रजवासी
श्रावण शु. १४, सं. २०८२ वि. (८ अगस्त, २०२५)
