कड़वी सच्चाई : आर्थिक देय स्तरीय अवार्ड के लिए
श श श श श श! चुप कलम अरे चुप रह मुंह बंद रख अपना, मुझे क्यों डांट रही तन्वी जाओ अपने जज़्बात और भावों को डांटो तुम, मैं कलम तो मासूम हूॅं। मैं तो वहीं कर रही जो भाव और तुम्हारे ही जज़्बात मुझे कर रहे करने को।
रूआंसा सा मुंह क्यों बना लिया अब तन्वी तुमने, बताओ? मैं कलम कहां दोषी हूॅं। सच मैं तो वही लिख रही जो तुम्हारे जज़्बात कह रहे लिखने को मुझे। तुम उनसे बात करो। उनको समझाओ।
अब आप पाठक सोच रहे होंगे की तन्वी को उसकी कलम ने ही फटकार क्यों लगा दी आज?
क्या बताऊं भाई मन में जज़्बात, भाव आए नहीं की बेलगाम ये कलम उनकी पोल-पट्टी खोल देती है तुरंत सब लिखकर। अब बताओ ना पाठकों मैं मासूम सी लेखिका तन्वी किसको समझाऊं, कलम को समझाती तो वो नाराज़ होती, भाव और जज़्बात से बात करती तो वो तो मेरी एक नहीं सुनते । उमड़-घुमड़ के आ ही जाते ज़हन में और कलम चुगलचोर कहीं की सब उगल देती मेरी लिख कर। चलिए जानते हैं आज जज़्बात और भाव कौन से आए और कलम लिखने को आतूर हो गयी।
दरअसल बात ऐसी है कि हर राज्य में आर्थिक देय स्तरीय प्रतियोगिता निकलती है। किसी एक विषय कला कौशल से संबंधित नहीं बल्कि सभी से संबंधित जैसे- खेल, नृत्य, साहित्य, गीत-संगीत अन्य।
अब आप पाठक कहेंगे की ये तो सबको ही पता है कौन सी नई बात है इसमें?
दरअसल बात ऐसी है कि राज्य स्तरीय प्रतियोगिता के अंतर्गत कुछ प्रतियोगिताएं एसी होती हैं कि जिसके अंतर्गत हमें सबके सामने शारिरिक तौर पर साबित नहीं करना पड़ता की वाकई उनमें काबिलियत है और ठीक कुछ प्रतियोगिताएं एसी होती जिसमें आप को फिजिकल तौर पर साबित करना होता है की प्रतियोगिता में जीता गया व्यक्ति वही है। जैसे- खेल, नृत्य, वाद्ययंत्र बजाना , पाक कला अन्य । परंतु जो कला शारीरिक तौर पर नहीं होती(फिजिकल) और प्रतियोगिता में कोई व्यक्ति काम दूसरों से करवाकर उस प्रतियोगिता में भाग लेता , बिना काबिलियत के और फिर भी विजयी होकर राज्य स्तरीय या अन्य आर्थिक या सम्मान पाता उनका क्या? खुले शब्दों में कहूॅं तो पुस्तक प्रतियोगिता, काव्य प्रतियोगिता, थिसिस प्रतियोगिता या अन्य जिसमें चयनकर्ता चयन तो कर देते विजयी का परंतु ये रूबरू नहीं देख पाते की जो चयनित हो विजयी रहा है क्या वाकई वो कार्य उसने किया है? या किसी ओर से तो नहीं करवाया? या आर्थिक भुगतान देकर तो नहीं करवाया वगैरह-वगैरह। कारण कुछ भी हो सकता है।
अरे चुप कलम- चुप कर….
नहीं तन्वी आज बोलने दो, आज अगर रोक दिया तो फिर कभी बोल पाऊं या नहीं। ये मुझे भी नहीं पता। और सच बोलने से क्यों घबराना।
कुछ जरूरतमंद ऐसे हैं जो अपनी आर्थिक स्थिति के चलते, कुछ कमाई के लिये अपनी कला, भावों, जज़्बातों से दूसरों को लिख कर दे रहे हैं और दूसरे उसकी कला को खरीदकर कर अपने नाम से बेच रहे कोई राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में भाग लेकर उससे विजयी हो रहे, तो कोई किसी प्रतियोगिता में। जबकि वह काम उन्होंने किया ही नहीं है या वह कला उनके भीतर समाई ही नहीं है। खैर एक बात तो है लेखक या अन्य कला में निपूर्ण अपनी कला से अपनी जरूरत पूरी तो कर सकता, और खरीदार झूठ बोलकर उसे खरीद सकता परंतु कलाकार के आंतरिक मन, मस्तिष्क, रोम-रोम में बसी कला तो कोई छीन ही नहीं सकता है। खैर जाने दो लेखक की जरूरत पूरी हो रही और भुगतान कर झूठ के आधार पर खरीदार अपने आप को साहित्यकार या अन्य कला अरे-अरे वही कला जो उसने खरीद तो ली परंतु उसका ज़मीर उसको सदैव याद दिलाएगा की ये उसने कला खरीदी है ना की उसके भीतर ये कला है। चलो मुझ कलम का पेट का दर्द खत्म हो गया क्यों कि तन्वी के भाव और जज़्बात ने इतना ही बोला लिखने के लिये लिख दिया। तन्वी गुस्से है मुझ कलम-भाव-जज्बात के ऊपर परंतु थोड़ी देर में वह भी मान जाएगी और फिर कुछ ना कुछ हम शैतानी कर हा हा हा हा ….. मेरा मतलब है हम कलम-भाव-जज्बात मिलकर उससे लिखवा ही लेंगे।
— वीना तन्वी
