वंदे भारत! (व्यंग्य)
रेल में यात्रा करना एक अनुभव है – कभी सुखद , तो कभी दुखद! यदि समय रहते आरक्षण मिल जाए तो सुखद वरना ‘नरक-सुख’ की प्राप्ति के लिए आपको मरने की आवश्यकता नहीं। जीते-जी स्वर्ग की प्राप्ति भले ही आपको न हो पर नारकीय दर्शन का आनंद रेल मंत्रालय के सौजन्य से इसी जन्म में हो जाएगा। भारतीय रेल में आरक्षित बर्थ मिलना ठीक वैसा है जैसे एक बेरोजगार कुरूप का विवाह विश्व सुंदरी हो जाना। हमारे ॠषि-मुनि स्वर्ग प्राप्ति की आकांक्षा के लिए की जानेवाली कठोर साधना का मर्म कलयुग में वही समझ सकता है जिसने भारतीय रेल में बर्थ के आरक्षण के लिए प्रयास किया हो। मैंने आरक्षण का घनघोर विरोध करनेवाले को भी बर्थ आरक्षित करवाने के लिए घंटों कतार में ऊँघते देखा है।
आज मेरे शहर से एक नयी ट्रेन का जन्म हुआ! गरीबी की कोख से अमीरी का अवतरण- वंदे भारत। इस खानदान की अनेक ट्रेने अब तक पैदा हो चुकी हैं, जो पटरियों पर अल्हड़ता दर्शा रही हैं- आधुनिका कहीं की! दिखने में सुंदर देहयष्टि! चलने में लचक के स्थान पर नववधू के समान सौम्यता! आकर्षण में मादक! कोच में घुसकर बैठने के बाद ही बहत्तर हूरों के सामीप्य का सुख बिना मौत के मिल गया। प्लेटफार्म से घुटनों पर धीरे-धीरे रेंगने आरंभ किया तो मुख्यमंत्री और महापौर जी ताऊ और चाचा बने हाथ हिलाकर उसकी अठखेलियों पर मुस्कुरा रहे थे। आश्चर्य तो तब हुआ जब यह नवजात पलभर में गजगामिनी से द्रुतगामिनी हो गई। इस गति को देखकर हृदय की गति भी बढ़ रही थी क्योंकि इस कमबख्त गति ने ही इसके पहले इसकी अनेक पूर्वजाओं को काल के गाल में झौंक दिया था।
रेल के भीतर नारों से हम भारत की वंदना कर रहे थे और वंदे भारत की वंदना बादल उमड़-घुमड़कर बाहर से। दूर-दूर तक फैली हुई हरियाली गा रही थी- बहारों फूल बरसाओ मेरा मेहबूब आया है।
‘वंदे भारत’ की गति किसी कारण धीमी हुई तो तभी बगल से एक और पेसेंजर ट्रेन गुजरती दिखी। इसमें यात्री बैठे नहीं थे, दरवाज़ों पर झूल रहे थे। कुछ चमगादड़ की तरह लटक रहे थे, तो अनेक कतलखाने जाते जानवरों की भाँति ठूँस हुए थे। उसमें बैठे अधनंगे देहाती बच्चे वंदे भारत में सवार कोकाकोला पीते और पिजा खाते बच्चों को ललचायी नजरों से निहार रहे थे। इस ट्रेन की चाल में थकावट थी। कराह रही थी! पीड़ा थी!एक पल को समझ न सका यह मर्म भेदिनी ध्वनि उसमें सवार गरीब भारतवासियों की है या ट्रेन की। मेरी आँखें नम हो गईं क्योंकि मैं ‘वंदे भारत’ के अंदर था और सामने की ट्रेन में ‘भारत’ पेसेंजर में लटक रहा था, टपक रहा था।
— शरद सुनेरी
