शोर मचता
शोर मचता, बिल्कुल शोर मचता
पत्र पत्रिकाओं, मीडियाओं में
श्रेष्ठ शीर्षक होता
मोटी मोटी अक्षरों में लिखे होते
या प्रमुख हेडलाइन्स होते
गर गिरे होते
किसी नेता के बंगला का छप्पर
मोटी-मोटी परतदार चद्दर
पर अफसोस
ढहे तो एक बेबस की छत है
जलमग्न हुए मजलूम का निलयत है
वो कर रहा गोहार
सड़क पे टपरी तानकर
वो पी रहा है बहते पानी को छानकर
पर इस दुःखद घटना पर
किसी की नजर नही गयी
वर्दी धारी हटा रहे
कर रहे रही-सही कमी को पूरी
वो मजलूम बिलख रहा
खुले आसमान के नीचे
बिन सहयोग के मर रहा
बिन किसी के हृदय पसीजे।।
— चन्द्रकांत खुंटे ‘क्रांति’
