लोक तंत्र की हत्या
एक दिन मेरे मित्र भाई भरोसे लाल सुबह सुबह ही आ धमके। मैं कहीं जाने को तैयार हो रहा था। परंतु बरसात के मौसम में कब बारिश आ जाए तो कुछ नहीं कहा जा सकता ऐसे ही मेरे मित्र भाई भरोसे लाल भी कब आ जाएँ , मैं कुछ नहीं कह सकता और कुछ भी क्यों न हो क्योंकि मैं कोई मंत्री तो हूं नहीं। और मंत्री तो दूर की बात है मैं तो कहीं का पार्षद भी नहीं हूं। जो किसी को मुझसे मिलने के लिए पहले टाइम यानी समय लेने की जरूरत पड़े। और यह इंग्लैंड या अमेरिका या कनाडा और आस्ट्रेलिया आदि भी नहीं जो किसी के घर पहुंचने के लिए पहले अपॉइंटमेंट लेनी पड़े यानि समय लेना पड़े। यहां तो जब मर्जी आए तब जाकर किसी का भी दरवाजा खटखटा सकते हैं। पर भाई भरोसे लाल तो मेरे बचपन के मित्र हैं। वह मेरे साथ बहुत अधिकार पूर्वक मित्र भाव भी रखते हैं।
दूसरी बात यह है कि भाई भरोसे लाल धर्म संप्रदाय में भी विश्वास करते हैं और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन भी भगवान के डर के मारे करते रहते हैं। तो उन्होंने संत तुलसीदास जी की मित्र गुण वर्णन की चौपाइयों भी कई बार पढ़ीं है। जिसमें लिखा है कि जे न मित्र दुख होहिं दुखारी उन्हें बिलोकत पातक भारी। उन्होंने यह चौपाई उन्होंने कितनी ही बार पढ़ी है रखी है और उन्हें याद भी खूब है पर वे इसका अर्थ पंक्ति के अनुसार नहीं लगाते अपितु दूसरा ही अर्थ लगाते हैं कि यदि वे दुखी हैं तो मित्रों को भी उन्हें दुखी कर ही देना चाहिए। वह मित्र के दुख में दुखी हों या न हों पर वे अपने दुख में मित्र को जानबूझकर दुखी करना ही सच्ची मित्रता मानते हैं। यदि खुद दुखी हैं तो दूसरों को भी दुखी जरूर करो। उनका यह मानना है।
वे सदा इसी सिद्धांत का पालन करते हैं। वह सुबह शाम ही नहीं रात के समय भी यानि कभी भी मेरे घर आ सकते हैं। आज भी वे अपने स्वभाव के अनुसार ही सुबह सुबह ही घर धमके। मैंने राम राम के बाद हलचाल पूछा तो उन्होंने उन्होंने बड़ा बुरा सा कड़वा सा मुंह बना कर कहा कि अब क्या क्या बताऊं बंधु !
यहां बताऊंगा तो कहीं आप उन्हें दूसरों को न बता दें में इसलिए नहीं बता रहा हूं। पर जब वे अंदर आकर बैठ गए तो मैंने स्वाभाविक पूछा कि भाई कहां से आ रहे हो ,तो उन्होंने खटारा पंखे की तरह अपना भाषण शुरू कर दिया कि भाई आजकल कतई पढ़ाई का तो बेड़ा ही गर्क हो गया हो चुका है। स्कूल में कोई मास्टर पढ़ाकर राजी नहीं है। बस सबको तनख़वाह से मतलब रहता है। बच्चों का भविष्य अंधेरे में डूबे तो डूब जाए। इन्हें इस से कोई मतलब नहीं है।
मास्टर तो मास्टर सरकार भी बच्चों के भविष्य के प्रति कोई ध्यान नहीं देती है। वह तो देश को अंधकार में ले जाना चाहती है और इन नेताओं को इतना भी पता नहीं कि बच्चे देश का भविष्य है यदि बच्चों का भविष्य बिगड़ जाए तो देश का भविष्य ही बिगड़ जाएगा। पर उन्हें तो अपनी ही कुर्सी से मतलब रहता है। उन्हें बच्चों की पढ़ाई और देश के भविष्य से क्या लेना देना। असल में तो सरकार की शिक्षा नीति की खराब है। भला ऐसे भी कहीं शिक्षा दी जाती है।
वह खटारा पंखे की खटर खटर करे ही जा रहे थे। पर मैंने भी बीच में ही उनका बटन जानी स्विच ऑफ कर दिया और पूछा कि भाई इस तरह क्यों सबको कोस रहे हो। ऐसी क्या गलती कर दी सरकार ने। जो सुबह-सुबह ही श्लोक सुनाए जा रहे हो। पर मेरे प्रश्न पर उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया और बजाए कारण बताने के सरकार को , शिक्षा नीति को तथा व्यवस्था आदि सबको कोसते रहे। पर मैंने जैसे तैसे उनके इस भाषण पर ब्रेक लगाया तो उन्होंने बताया कि देखो आपके भतीजे को मैंने पूरा साल टयूशन भी पढ़वाया। वह बिना छुट्टी किये स्कूल भी जाता रहा। एक्स्ट्रा क्लास में भी जाता था। पर फिर भी स्कूल वालों ने उसे फेल कर दिया।
अब मुझे उनके गुस्से का कारण आसानी से समझ आ गया कि जैसे जब कोई नेता हार जाता है तो वह कभी ईवीएम पर दोष लगाता है और कभी सरकार पर और कभी चुनाव आयोग पर दोष मढ़ने लगता है। पर वह अपनी हार स्वीकार नहीं करता है कि उनकी पार्टी की भी नीतियां ठीक नहीं थी। ठीक ऐसे ही जैसे कोर्ट से दोषी ठहराये जाने के बाद विपक्षी नेता इसे प्रजातंत्र की हत्या बता देते हैं और थोड़ी थोड़ी देर में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने लगते हैं। पार्टी के वर्कर सड़कों पर जलसे जलूस करने लगते हैं यहां तक तो ठीकहै पर वे तो पुलिस से भी भिड़ने लगते हैं।
इतना ही नहीं सरकार पर भी बिना सिर पैर के आरोप लगने लगते हैं कि सरकार विपक्ष का गला घोट रही है और लोकतंत्र की हत्या करने की कोशिश में लगी है। पर हम रुकेंगे नहीं और ना ही अपनी गलती के लिए माफी मांगेंगे। हम तो सरकार से माफी मंगवा कर रहेंगे। हमें जनता की लड़ाई लड़ते रहेंगे। पर उनसे यह पूछो कि भाई आप जनता की कौन सी लड़ाई लड़ रहे हो। आप तो अपनी सजा के कारण जले जा रहे हो और जैसा किया वैसा तो भुगतना ही पड़ेगा और सजा तो आपको न्यायालय ने दी है। इसमें सरकार बीच में कहां से आ गई।
परन्तु बस आप अपनी गलती न मान कर या उसे छुपाने के लिए यह दुनिया को कोस रहे हो। पर अपनी गलती की ओर ध्यान नहीं दे रहे हो। ऐसे ही मेरे मित्र भरोसे लाल भी अपनी और अपने छोरे की गलती ना मानकर कभी सरकार को गालियां देते हैं ,तो कभी नेताओं को ,कभी मास्टर मास्टरनियों को कोस रहे हैं। जबकि वह बच्चे की पढ़ाई पर यदि थोड़ा भी ध्यान देते तो उन्हें यह दिन क्यों देखना पड़ता। वे सोचते हैं कि बस पैसा खर्च करने से भी बच्चा पढ जाएगा। ठीक ऐसे ही जैसे कुछ व्यक्ति जबरस्ती अपने पप्पू को नेता बनाने पर तुला है। ऐसे ही भाई भरोसे लाल के भी सपने तो बहुत ऊंचे हैं। पर अपनी गलती की न देख कर बाकी सब को दोष दे रहे हैं।
— डॉ. वेद व्यथित
