विंडो सीट (भाग – 3) : शब्दों के पार
ट्रेन में हुई उस मुलाक़ात को कई महीने बीत चुके थे, लेकिन समीर चाह कर भी कुछ भूल नहीं पा रहा था। उसके भीतर वह दृश्य अब भी जस का तस मौजूद था — वह बेचैन था मानों दिल पर रखा बोझ, नासूर बन चुका हो। ट्रेन में मिले उस क्षण को याद कर वह रोज़ सोचता है — “काश, उसने मेरा सच सुन लिया होता”। वो अपनी कहानी सुरभि तक पहुँचाना चाहता था, इसलिए उस मुलाकात के तुरंत बाद उसने, अपने हिस्से का सच लिख लिखना शुरू किया था। वह लिखता गया… बिना रुके … वो विंडो सीट वाली मुलाक़ात, दस साल पुराना बिछड़ना, सुमन की मजबूरी, अपना डर, और वह अपराधबोध जो आज भी उसे सोने नहीं देता था।
कहानी पूरी होने पर उसने उसे एक बार पढ़ा। हर पंक्ति में उसका दिल था, हर लफ़्ज़ में उसकी आँखों का पानी था । कहानी को सोशल मीडिया पर डालते हुए शीर्षक रखा — “जो कहा नहीं गया”। पोस्ट करते समय उसने न सोचा कि इसे कितने लोग पढ़ेंगे, न ये कि इसे कौन पहचान लेगा। बस इतना सोचा — “शायद कभी यह उसके पास पहुँच जाए! उसकी सुरभि के पास।”
उधर, सुरभि अब एक लेखिका बन चुकी थी और सोशल मीडिया पर भी सक्रिय थी। घर के कामकाजों के बाद समय मिलने पर — नई-नई कहानियाँ पढ़ना, लेखकों की हौसला-अफ़ज़ाई करना, उसका रोज़ का हिस्सा था।
एक रात, किसी रीडर्स ग्रुप में उसे एक कहानी का लिंक मिला — “जो कहा नहीं गया”। शीर्षक देखते ही उसके भीतर कुछ खिंच-सा गया और उसने पेज खोल उसे पढ़ना शुरू किया।
पहला पैरा… और उसकी सांस थम गई। हर वाक्य उसे अपने अतीत में ले जा रहा था — वही विंडो सीट, वही बातें, वही खामोशियाँ। आगे बढ़ते-बढ़ते उसने महसूस किया कि यह महज़ कहानी नहीं, उसकी अपनी ज़िंदगी का आईना है। जब तक कहानी खत्म हुई, उसकी आँखें भीग चुकी थीं। कोई शक नहीं था कि यह समीर के हिस्से का सच है।
सुरभि ने लैपटॉप बंद किया और कुछ देर चुपचाप बैठी रही। कमरे में खामोशी थी, पर उसके भीतर यादों का शोर गूंज रहा था।
वह सोचने लगी — “क्या अब इन शब्दों का कोई मतलब है? क्या इतने सालों बाद ये सफाई मेरे लिए मायने रखती है? या यह सिर्फ़ उसके दिल का बोझ उतारने की कोशिश है?”
वह कहानी वाले पेज पर वापस लौटी। नीचे कमेंट बॉक्स में कर्सर blink कर रहा था। उसने टाइप करना शुरू किया — “समीर, शायद अब बहुत देर हो चुकी है, काश तुम …” — लेकिन फिर रुक गई। बैकस्पेस दबाकर सब मिटा दिया। कुछ देर सोचा, फिर बस उसे ‘like’ कर दिया।
और दूसरी तरफ, समीर को मोबाइल पर नोटिफिकेशन मिला — “Surabhi Sharma liked your post.”
वह नाम देखते ही उसके भीतर कुछ हिल गया। यह सुरभि थी, उसकी सुरभि।
उसने स्क्रीन को देर तक देखा। उस ‘like’ में न कोई सवाल था, न कोई जवाब, पर समीर के लिए यह एक इशारा था — कि उसकी बात वहाँ पहुँच गई है जहाँ वह पहुँचाना चाहता था।
उस रात दोनों ने अपने-अपने शहर में चैन की नींद सोई। दोनों जानते थे — कुछ कहानियाँ चुपचाप भी पूरी हो जाती हैं। विंडो सीट का सफर अब सचमुच खत्म हो चुका था।
— अंजु गुप्ता ‘अक्षरा’
