पर्यावरण

नदी पुनर्जीवन: संस्कृति, सभ्यता और अस्तित्व की रक्षा

“अप्सु मे सोमोऽभूत्, अप्सु मे अग्निरभवत्।” (ऋग्वेद)

अर्थात जल में ही सोम है, जल में ही अग्नि का वास है। वास्तव में जल ही समस्त जीवन का आधार है। हमारे शरीर का लगभग 75% भाग जल से बना है। यह केवल शारीरिक ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सभ्यतागत दृष्टि से भी जीवन का मूल है। जिस प्रकार रक्त हमारी नसों में प्रवाहित होकर हमें जीवित रखता है, उसी प्रकार नदियाँ धरती की धमनियाँ हैं, जो जलरूप में जीवन को निरंतर प्रवाहित करती रहती हैं।

भारतीय संस्कृति में तो नदियों को माता का स्थान दिया गया है। “गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥” – इस प्राचीन प्रार्थना में हम नदियों का आह्वान करते हैं कि वे हमारे जीवन में सन्निहित रहें। किंतु आज दुख की बात है कि जिन नदियों को हमने जीवनदायिनी माना, वही नदियाँ सूख रही हैं, सिकुड़ रही हैं या प्रदूषण के बोझ तले कराह रही हैं। इसीलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न है – क्या हम नदियों का पुनर्जीवन कर पाएँगे?

नदियाँ: जीवनदायिनी धाराएँ

“नदी” शब्द सुनते ही हमारे मन में शीतलता, हरियाली और जीवन की छवि उभर आती है।
नदी का अर्थ केवल बहते पानी से नहीं है, बल्कि उससे जुड़ी पूरी पारिस्थितिकी से है – खेत, वनस्पति, पशु-पक्षी, मानव बस्तियाँ और आध्यात्मिक जीवन।

भारत की प्राचीन सभ्यताओं की कहानी भी नदियों के इर्द-गिर्द ही बुनी गई है। गंगा, यमुना और सरस्वती के तट पर वैदिक सभ्यता फली-फूली। नर्मदा, गोदावरी और कावेरी के किनारे दक्षिण भारत की संस्कृति ने आकार लिया। सिंधु नदी के नाम पर तो हमारे देश का नाम ही पड़ा – हिंदुस्तान। नदियाँ केवल जलधारा नहीं हैं, वे हमारी संस्कृति, कृषि और आध्यात्मिकता की जीवनरेखा हैं। जिस प्रकार शरीर में रक्त प्रवाह रुक जाए तो मृत्यु निश्चित है, उसी प्रकार यदि नदियाँ सूख जाएँ तो धरती पर जीवन का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा।

भारतीय संस्कृति और नदियों का संबंध:

भारतीय परंपरा में नदियों को माता कहा गया है। गंगा को गंगा मैया, यमुना को यमुनाजी, नर्मदा को रेवा माता और गोदावरी को गौरी माता के रूप में पूजा जाता है।
“गंगे यमुने चैव, गोदावरी सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरी, जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥”
यह प्रार्थना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह संदेश है कि जल और नदी हमारे जीवन में हर क्षण उपस्थित रहें।
गंगा स्नान, नर्मदा परिक्रमा, कावेरी जयंती, गोदावरी महापुष्कर – ये सब परंपराएँ दर्शाती हैं कि हमारी संस्कृति में नदियों का स्थान केवल जलस्रोत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे आस्था और जीवन के प्रतीक हैं।

नदी संकट: सूखती धाराएँ और प्रदूषण

आज स्थिति यह है कि हमारी अधिकांश नदियाँ या तो प्रदूषण से भर चुकी हैं या उनका जलस्तर घट चुका है।

  1. प्रदूषण का संकट – औद्योगिक कचरा, सीवेज और प्लास्टिक कचरे ने नदियों को गंदे नालों में बदल दिया है। गंगा और यमुना इसका उदाहरण हैं।
  2. सूखती धाराएँ – छोटी नदियाँ और धाराएँ पूरी तरह विलुप्त होने की कगार पर हैं। सरस्वती तो हजारों साल पहले लुप्त हो गई थी, लेकिन अब आधुनिक नदियाँ भी उसी राह पर हैं।
  3. रेत खनन – अंधाधुंध रेत खनन ने नदी की प्राकृतिक धारा को नुकसान पहुँचाया है।
  4. बाँध और अवरोध – बड़े-बड़े बाँधों और तटबंधों ने नदी के प्राकृतिक प्रवाह को रोक दिया है।
  5. जनसंख्या और शहरीकरण – शहरों का कचरा सीधे नदियों में गिराया जा रहा है।
    स्थिति इतनी गंभीर है कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार भारत की 350 से अधिक नदियाँ गंभीर रूप से प्रदूषित श्रेणी में आ चुकी हैं।

नदी पुनर्जीवन की आवश्यकता:

अब प्रश्न उठता है कि नदी पुनर्जीवन क्यों आवश्यक है?
नदियाँ जीवन का आधार हैं – पीने का पानी, सिंचाई, मत्स्य पालन, उद्योग और परिवहन सभी नदियों पर निर्भर हैं।
नदियाँ संस्कृति और पर्यटन की धुरी हैं – वाराणसी, उज्जैन, हरिद्वार, प्रयागराज जैसे शहर नदियों की वजह से ही धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखते हैं।
नदियाँ पारिस्थितिकी संतुलन की रक्षक हैं – जलचक्र, भूजल स्तर और जैव विविधता नदियों से ही जुड़ी है।
यदि नदियाँ समाप्त हो जाएँगी तो केवल पानी की कमी नहीं होगी, बल्कि सभ्यता का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

नदी पुनर्जीवन के प्रयास:

नदी पुनर्जीवन का अर्थ है – नदियों को उनकी प्राकृतिक अवस्था में लौटाना। इसके लिए कई प्रकार की पहल की जा रही है –

  1. सरकारी योजनाएँ – नमामि गंगे परियोजना (गंगा को स्वच्छ और अविरल बनाने का प्रयास)। जल जीवन मिशन और राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना। कई राज्यों ने अपनी नदियों के लिए विशेष “नदी संरक्षण प्राधिकरण” बनाए हैं।
  2. सामाजिक आंदोलन – इशा फाउंडेशन का “रैली फॉर रिवर्स” अभियान। नर्मदा बचाओ आंदोलन।
    महाराष्ट्र और कर्नाटक में स्थानीय स्तर पर छोटी नदियों के पुनर्जीवन की कई सफल कहानियाँ।
  3. जनभागीदारी – ग्रामीण क्षेत्रों में चेक डैम और तालाब बनाकर वर्षा जल को संचित करना। जलग्रहण क्षेत्र में वृक्षारोपण करना। गाँवों और कस्बों में “नदी मित्र मंडल” बनाना।

जनभागीदारी: भविष्य की कुंजी

नदी पुनर्जीवन केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें आम नागरिक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।
हम अपने घरों और शहरों का कचरा नदियों में न डालें।
वर्षा जल संचयन और पेड़ लगाने की आदत डालें।
बच्चों को जल संरक्षण का महत्व समझाएँ।
नदियों को “धार्मिक स्थल” भर नहीं बल्कि जीवित धरोहर मानकर उनकी देखभाल करें।

नदी पुनर्जीवन की सफल कहानियाँ:
भारत में कई जगहों पर छोटी नदियों को पुनर्जीवित करने में सफलता मिली है।
महाराष्ट्र में हिवरे बाज़ार गाँव ने वर्षा जल संचयन और वृक्षारोपण से सूखी धाराओं को फिर से जीवित कर दिया।
कर्नाटक में कुछ नदियों के तट पर गाँव वालों ने स्वयं श्रमदान करके नदियों की गहराई बढ़ाई और प्रदूषण रोका।
राजस्थान के अलवर में राजेंद्र सिंह को “जलपुरुष” कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने हजारों तालाब बनवाकर सूखी अरवरी नदी को पुनर्जीवित कर दिया।
ये उदाहरण बताते हैं कि यदि सामूहिक इच्छा शक्ति हो, तो सूखी धाराएँ भी फिर से बहने लगती हैं।

नदियों के बिना जीवन असंभव:

“नद्यो वः शं यच्छन्तु” – ऋग्वेद में प्रार्थना की गई है कि नदियाँ हमें कल्याण दें।
लेकिन यह तभी संभव है जब हम नदियों को उनका सम्मान लौटाएँ।
नदी पुनर्जीवन केवल पर्यावरणीय प्रश्न नहीं, बल्कि यह संस्कृति, सभ्यता और अस्तित्व का प्रश्न है।
यदि हम अपनी नदियों को नहीं बचाएँगे तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ नहीं करेंगी।
इसलिए अब यह समय है कि हम सब मिलकर प्रतिज्ञा लें –
हम नदियों को प्रदूषित नहीं करेंगे।
हम जल का संरक्षण करेंगे।
हम नदियों को माता के रूप में पूजेंगे ही नहीं, बल्कि उन्हें जीवन देने वाले स्रोत के रूप में सुरक्षित भी रखेंगे।
नदी: स्वच्छा बहतु नित्यम्, जनजीवनं तया वर्धताम्।
प्रकृति रक्ष्यते यदि, भविष्यः सुरक्षितः भवेत्॥

— विभा कनन (शिक्षिका)

विभा कनन

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