कविता
तेरा दुःख भी तेरा है…..तेरा सुख भी तेरा है
मगन हैं सभी आज अपनी अपनी दुनिया में
कोई समझे या न समझे मैंने समझाना छोड़ दिया
दुनिया के सब नाते झूठे दिल को मनाना छोड़ दिया
दुःख में तेरे न पूछने आएंगे स्वार्थ वश दौड़े आएंगें
दुनिया को कब तक दर्द से अपने अवगत कराओगे
आँखों में जो छलके तेरे आँसू क्या छिपा पाओगे
मतलब की इस दुनिया में न कोई तेरा साथी है
तेरे मन की बाती ही अँधेरों में साथ निभाती है
सब कुछ पीछे छोड़कर झूठे बंधन को मैंने तोड़ दिया
साया भी तेरा साथी नहीं जो बोया था वही तो पायेगा
पढ़ा था कभी मैंने भी एक अटल सत्य
दाता के दरबार में बदले कहीं न जाएँ
सब कुछ तो उसके हाथ है जिसने हमें जीवन दिया
दीवारों के गले लगकर रोना मैंने कब का छोड़ दिया
कोई समझे या न समझे अब मैंने समझाना छोड़ दिया
— वर्षा वार्ष्णेय
