कविता

कविता

तेरा दुःख भी तेरा है…..तेरा सुख भी तेरा है
मगन हैं सभी आज अपनी अपनी दुनिया में
कोई समझे या न समझे मैंने समझाना छोड़ दिया
दुनिया के सब नाते झूठे दिल को मनाना छोड़ दिया
दुःख में तेरे न पूछने आएंगे स्वार्थ वश दौड़े आएंगें
दुनिया को कब तक दर्द से अपने अवगत कराओगे
आँखों में जो छलके तेरे आँसू क्या छिपा पाओगे
मतलब की इस दुनिया में न कोई तेरा साथी है
तेरे मन की बाती ही अँधेरों में साथ निभाती है
सब कुछ पीछे छोड़कर झूठे बंधन को मैंने तोड़ दिया
साया भी तेरा साथी नहीं जो बोया था वही तो पायेगा
पढ़ा था कभी मैंने भी एक अटल सत्य
दाता के दरबार में बदले कहीं न जाएँ
सब कुछ तो उसके हाथ है जिसने हमें जीवन दिया
दीवारों के गले लगकर रोना मैंने कब का छोड़ दिया
कोई समझे या न समझे अब मैंने समझाना छोड़ दिया

— वर्षा वार्ष्णेय

*वर्षा वार्ष्णेय

पति का नाम –श्री गणेश कुमार वार्ष्णेय शिक्षा –ग्रेजुएशन {साहित्यिक अंग्रेजी ,सामान्य अंग्रेजी ,अर्थशास्त्र ,मनोविज्ञान } पता –संगम बिहार कॉलोनी ,गली न .3 नगला तिकोना रोड अलीगढ़{उत्तर प्रदेश} फ़ोन न .. 8868881051, 8439939877 अन्य – समाचार पत्र और किताबों में सामाजिक कुरीतियों और ज्वलंत विषयों पर काव्य सृजन और लेख , पूर्व में अध्यापन कार्य, वर्तमान में स्वतंत्र रूप से लेखन यही है जिंदगी, कविता संग्रह की लेखिका नारी गौरव सम्मान से सम्मानित पुष्पगंधा काव्य संकलन के लिए रचनाकार के लिए सम्मानित {भारत की प्रतिभाशाली हिंदी कवयित्रियाँ }साझा संकलन पुष्पगंधा काव्य संकलन साझा संकलन संदल सुगंध साझा संकलन Pride of women award -2017 Indian trailblezer women Award 2017