लघुकथा

उत्कर्ष

आज उत्कर्ष व्यापार में उत्कर्ष का तराना गा रहा था, लेकिन कुछ समय पहले तक ऐसा नहीं था.
“कितने दिनों से व्यापार में स्थिरता लाने की कोशिश कर रहा हूँ, हर दांव में कोई-न-कोई पेच रह जाता है?” उत्कर्ष बहुत उदास हो गया था.
“लागत ही नहीं निकल पा रही तो व्यापार का क्या फायदा और जीने का क्या लाभ!” उत्कर्ष का उत्कर्ष अपकर्ष होता जा रहा था.
इसी धुन में वह किसी अनजान राह पर चला जा रहा था.
“इतने पत्थरों के बीच अंकुर पौधा बनता जा रहा है, वो भी पाइप की टपकती एक-एक बूंद से!” सहसा उसकी सोच का अंकुर फूट पड़ा.
“यह अंकुर भी बीज से ही हुआ होगा, जो फूटने के लिए निरंतर संघर्ष और समर्पण के लिए तैयार रहा होगा!” उसकी सोच का दायरा विस्तृत होता जा रहा था.
“बीज से पौधा बनने में कितना समय लगा होगा, निश्चय ही एक दिन में तो ऐसा हुआ ही नहीं होगा!” उसकी सोच में असीमता के दर्शन हो रहे थे.
“हमारी सोसाइटी की दीवार में तो सातवीं मंजिल पर पीपल का पौधा निकल आया है.” सोच का विस्तार आसमान तक पहुंच गया था!
“ये अंधकार आने वाले भोर की पहचान है !” कल ही तो मैंने पढ़ा था!
“चारों ओर सफलता-ही-सफलता बिखरी हुई है, मुझे सफलता क्यों नहीं मिलेगी, बस थोड़ा-सा धैर्य धारण करना पड़ेगा.”
शायद वही धैर्य अब उत्कर्ष हो गया था!

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244