नयी आग फिर अब जलाने लगे हैं
कुछ इस तरह दूर जाने लगे हैं
खिड़कियों में परदे समाने लगे हैं
रहने लगी है दहलीज सूनी
कुछ इस तरह से सताने लगे हैं
जागीर सारी उजड़ने लगी अब
बनाने में जिसको ज़माने लगे हैं
चिरागों की लौ से नजर आने वाले
दिये को ही अब छुपाने लगे हैं
समाँ में समाया कोई राज लगता
फ़कत ही झूले चलाने लगे हैं
बुझी जो अंगीठी तलाश के आयी
नयी आग फिर अब जलाने लगे हैं
राज कुमार तिवारी “राज”
