गीतिका/ग़ज़ल

नयी आग फिर अब जलाने लगे हैं

कुछ इस तरह दूर जाने लगे हैं
खिड़कियों में परदे समाने लगे हैं

रहने लगी है दहलीज सूनी
कुछ इस तरह से सताने लगे हैं

जागीर सारी उजड़ने लगी अब
बनाने में जिसको ज़माने लगे हैं

चिरागों की लौ से नजर आने वाले
दिये को ही अब छुपाने लगे हैं

समाँ में समाया कोई राज लगता
फ़कत ही झूले चलाने लगे हैं

बुझी जो अंगीठी तलाश के आयी
नयी आग फिर अब जलाने लगे हैं

राज कुमार तिवारी “राज”

राज कुमार तिवारी 'राज'

हिंदी से स्नातक एवं शिक्षा शास्त्र से परास्नातक , कविता एवं लेख लिखने का शौख, लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र से लेकर कई पत्रिकाओं में स्थान प्राप्त कर तथा दूरदर्शन केंद्र लखनऊ से प्रकाशित पुस्तक दृष्टि सृष्टि में स्थान प्राप्त किया और अमर उजाला काव्य में भी सैकड़ों रचनाये पब्लिश की गयीं वर्तामन समय में जय विजय मासिक पत्रिका में सक्रियता के साथ साथ पंचायतीराज विभाग में कंप्यूटर आपरेटर के पदीय दायित्वों का निर्वहन किया जा रहा है निवास जनपद बाराबंकी उत्तर प्रदेश पिन २२५४१३ संपर्क सूत्र - 9984172782