घनाक्षरी छन्द
बेगानी सी दुनिया की, गलियों में गुम हुई,
लग रहा नाम पता, खुद का भूलाने लगी।
सोचा था कि भर दूंगी रंग सुनहरे सभी,
पंक भरे रंगों से मैं खुद को बचाने लगी।
मधुजा मधु को लिये, विष जो मिटाने चली,
हो के मजबूर देखो, विष में नहाने लगी।
दुनियां जो देखी ऐसी, देख ना सकूं मैं जैसी,
जानकर इसको मैं जान से ही जाने लगी।
— नीतू शर्मा “मधुजा”
