प्यारी सेंडिल
मैंने मचल कर अपनी भाभी से कहा “भाभी प्लीज मुझे वो आपकी सेंडिल पहनने को दे दो ना, मेरे स्कूल में हम बारहवीं कक्षा के बच्चों को फेयरवेल पार्टी दी जा रही है। मैंने पापा से नई ड्रेस के लिए काफी पैसे ले लिए हैं, सेंडिल आप देती तो कुछ बचत हो जाती”
दरअसल भैया की नई नई शादी हुई थी,तो पापा भी भैया से पैसा वगैरह की मांग नहीं करते थे।और पापा की तनख्वाह मैं, मां और पापा हम तीनों के लिए ठीक-ठाक थी। भाभी ने साफ मना करते हुए कहा “नहीं छोटी, तुम्हारे भैया ने उस सेंडिल को मेरे लिए बहुत ही प्यार से खरीदा है।उसे मैं किसी को नहीं दूंगी। मैं मन मारकर रह गयी। कालेज की पढ़ाई पूरी होते ही मेरी शादी हो गयी।शादी के बाद जब मैं पग फेरे पर मायके आई तो देखा वही सेंडिल कामवाली पहनकर आयी और दरवाजे पर उतार कर वह काम करने लगा।
मेरी आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। मैंने भाभी से सेंडिल वाले बात छेड़ी तो कहने लगी वो तो पुरानी होने पर उसे दी है। बेकार कचरे पर पड़ा रहता। मेरी आह निकल गयी मैं मन ही मन कहने लगी भैया की प्यार से दी गई सेंडिल का सम्मान मेरे पैरों पर खो जाता और उस कामवाली के पैरों की शोभा बढ़ा रहा है।
— अमृता राजेन्द्र प्रसाद
