मुक्तक/दोहा

मुक्तक

यहाँ झूठ के सौदागर हैं, सँभल जाईये,
भेड के नकाब मे भेडिये, सँभल जाईये।
मानवता है शर्मसार, स्वार्थ की दुनिया में,
इन्सानियत के दुश्मनों से, सँभल जाईये।

कौन क्या कह रहा, पहले विचारिये,
सत्य की कसौटी पर, परखते जाइये।
जाति- धर्म नाम पर, शिकारी फँसाते,
दुश्मन की चाल समझ, मोहरे चलाइये।

दोस्त और दुश्मन को पहचानना सीखिए,
अपने और पराये को भी जानना सीखिए।
मीठे होते शहद के माफ़िक़, बचिये उनसे,
नीम करेले से स्वास्थ्य का, महत्व सीखिए।

— डॉ अ कीर्तिवर्धन