ग़ज़ल
मर गए रिश्ते कि इतनी बदज़ुबानी हो गई
एक झटके में कहानी सब पुरानी हो गई
जान का दुश्मन बना जो जान देता था कभी
साझे सपनों की सभी ज़िंदा निशानी खो गई
खिंच गई दीवार नफ़रत की हमारे दरमियाँ
बीच रस्ते में ज़िबह जैसे जवानी हो गई
‘आपका बंटी’ घृणा की आग में जलता रहा
और शर्म-ओ-हया सारी पानी-पानी हो गई
हम किसी मंज़िल पे पहुंचे ही नहीं थे आजतक
ट्रेन – सी पटरी से उतरी ज़िंदगानी हो गई
ख़्वाब के क़दमों में जैसे लड़खड़ाहट भर गई
ज़िंदगी छतरी की ज्यों टूटी कमानी हो गई
— डॉ. ओम निश्चल
