कहाँ ले पाते मजे जिंदगी के
कहाँ ले पाते मजे जिंदगी के,
कल का इन्तजार कर के ।
दिन-रात कटती रहती जिंदगी,
सोचते उलझने समेट कर के।
बचपन नादानी में खोते रहे ,
जवानी जीवन को सजाने में ।
घर-गृहस्थी का भार जब आया,
लगे बचाने तिनका तिनका कर के।
गुजरी कब उम्र पता ही न चला,
चश्मा चढ़ा आंखों में, कानों में ठेपी ।
वी पी बढ़ा तो लगा हुआ अधेड़,
क्या अब ठीक होगा दबा कर के ।
खुद का पेट काट अपने सोये,
काहे को संजोये तिनका तिनका।
रही न किसी काम की ये दौलत,
सोचें बिस्तर पर आंसू बहा कर के ।
— शिवनन्दन सिंह
