कविता
एक पल में सुख लगता है
अगले ही पल दुखों का मेला है
ये जीवन क्या है कौन जान पाया
संघर्षों का लगता यहाँ रेला है
रात का सन्नाटा अक्सर रुला देता है
जब अतीत खुद को दोहराता है
सिसकियाँ मुँह दबाकर रोती हैं
जाने क्या क्या नसीब दिखलाता है
सुना है अक्सर लोगों से मैंने
तुम्हारा सुखों से करीबी नाता है
क्या क्या बतलायें हम उनको
जिंदगी सुखों का नहीं दुख का खाता है
झूठी खुशियों की खातिर जाने क्यों
हम मीठी-मीठी बातों में आ जाते हैं
भुलाकर कड़वे सत्य को अक्सर कि
कोई नहीं यहाँ किसी का सिर्फ दिखावा है
दुनिया कुछ भी तो नहीं सिवा नाटक के
एक स्वप्न छलावा है सागर है इच्छाओं का
त्याग कर उम्मीदों को इस झूठे दौर में
सत्य की नाव में दूर पार उतर जाना है
— वर्षा वार्ष्णेय
